स्वाद भले बिगड़े, पर देश और सेहत का बजट एकदम संतुलित रहेगा!
रिमझिम फुहारें पड़ रही थीं। चाय की टपरी पर लोग चुस्कियों से ज्यादा सरकार को कोस रहे थे। मुद्दा था—शक्कर की बढ़ती कीमतें!
किसी का बजट बिगड़ रहा था, तो किसी का चाय का जायका। माहौल एकदम गंभीर था, तभी अपने प्यारे मोहन हाथ में छाता झूलाते हुए आ पहुंचे। टपरी की बेंच पर जमते हुए उन्होंने ज्ञान का खजाना खोल दिया—“अरे भइया! बात-बात पर सरकार को कोसना और रोना-धोना छोड़ो। जरा पॉजिटिव सोच रखो! आपदा में भी अवसर तलाशना सीखो।”
टपरी वाले रामू काका ने केतली रोककर पूछा—“प्यारे! शक्कर महंगी होने में कौन-सा अवसर दिख रहा है तुम्हें?”
प्यारे मोहन ने गमछा संभालते हुए महफिल लूटने वाले अंदाज में गिनाना शुरू किया:
- गैस और पेट की बचत: चाय कम बनेगी, तो शक्कर, पत्ती और दूध बचेगा। रसोई गैस की बचत तो होगी ही, साथ ही सुबह-सुबह पेट में बनने वाली गैस से भी मुक्ति मिलेगी!
- मिठाइयों पर लगाम: शक्कर महंगी तो मिठाइयां महंगी। कम खरीदेंगे, तो जेब में रोकड़ा बचेगा। मिठाई कम पचेगी, तो पेट फिर ‘गैस-फ्री’ रहेगा।
- हेल्थ एकदम चकाचक: जब मीठा कम पेट में जाएगा, तो डायबिटीज (शुगर) पास फटकेगी नहीं। शरीर फिट रहेगा, बीमारियां दूर भागेंगी और डॉक्टरों के भारी-भरकम बिलों पर ब्रेक लग जाएगा।
- चींटियों का पलायन: घर में शक्कर ही नहीं रहेगी, तो चींटियां क्या अचार डालने आएंगी? पेस्ट कंट्रोल का खर्चा शून्य!
- बच्चों की सेहत दुरुस्त: बच्चे कम मीठा खाएंगे तो पेट में ‘चिनूना’ (कीड़े) नहीं होंगे। सिरप पिलाने की नौबत ही नहीं आएगी।
इतना कहकर प्यारे मोहन ने टपरी वाले की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोले—“अब बताओ, शक्कर महंगी करके सरकार ने तुम्हारा भला किया या बुरा?”
पूरी टपरी पर सन्नाटा छा गया। तभी पीछे से किसी ने चुटकी ली—“प्यारे भाई, फायदा तो समझ आ गया, पर अब तुम्हारी इस ‘पॉजिटिव’ चाय का ऑर्डर कौन दे रहा है?”
प्यारे मोहन हंसे और बोले—“अरे, दो कप बिना शक्कर की ‘हेल्दी’ चाय बनाओ रामू काका, आज की फिजूलखर्ची हम खुद बचाएंगे!”
