Monday, June 1, 2026
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बड़गान में बड़ा हादसा: 10 करोड़ के निर्माणाधीन पुल की बीम टूटी, रात के अंधेरे में पलटी क्रेन; भ्रष्टाचार की आशंका

"पहली ही लॉन्चिंग में टूट गई रीढ़! 10 करोड़ के बड़गान पुल में 'तराई की चोरी' पड़ी भारी, रात के अंधेरे में पलटी क्रेन।"

जनता के पैसे पर भ्रष्टाचार का हथौड़ा! बड़गान के शक्ति घाट पर बनते-बनते ही टूट गया पुल, क्या ठेकेदार को बचा रहा है विभाग?”

रहली (सागर)। सागर जिले की रहली तहसील अंतर्गत ग्राम बड़गान के शक्ति घाट पर एक बड़ा हादसा सामने आया है। यहाँ मध्य प्रदेश सेतु निर्माण निगम द्वारा करीब 10 करोड़ रुपये की लागत से बनाए जा रहे पुल का निर्माण कार्य पहली ही गर्डर लॉन्चिंग के दौरान ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। शनिवार की रात अंधेरे में चल रहे काम के दौरान पिलर उठाते समय भारी-भरकम बीम बीच से ही टूट गई, जिसके चलते गर्डर लॉन्च कर रही क्रेन असंतुलित होकर पलट गई। इस घटना के बाद से निर्माण एजेंसी और ठेकेदार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
​पहली ही लॉन्चिंग में खुली पोल, 2027 में पूरा होना है प्रोजेक्ट
​विदित हो कि इस पुल का निर्माण कार्य दिसंबर 2027 तक पूरा किया जाना है। लेकिन प्रोजेक्ट की शुरुआत में ही निर्माण की पोल खुल गई है। स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शनिवार की रात शक्ति घाट पर पुल का काम धड़ल्ले से चल रहा था। इसी दौरान क्रेन की मदद से भारी बीम को उठाने का प्रयास किया गया, लेकिन घटिया निर्माण के कारण बीम वजन सहन नहीं कर सकी और बीच से ही दो टुकड़ों में टूट गई। बीम टूटते ही क्रेन का संतुलन बिगड़ा और वह पलट गई।


​क्रेन ऑपरेटर का बड़ा बयान: मीडिया में छपी खबरों के अनुसार क्रेन ऑपरेटर ने निर्माण कार्य पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ऑपरेटर का सीधा आरोप है कि:
​बीम और पिलर के निर्माण में बेहद घटिया सामग्री का उपयोग किया गया है।
​कंक्रीट को मजबूती देने के लिए जो तराई (पानी का छिड़काव) की जानी थी, उसमें भारी चोरी की गई है।
​बिना पर्याप्त मजबूती के ही इतनी भारी बीम को लॉन्च करने का प्रयास किया जा रहा था, जिसके चलते यह हादसा हुआ।
​ठेकेदार को बचाने में जुटा सेतु निर्माण निगम!
​घटना के बाद से ही क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है। 10 करोड़ रुपये के इस भारी-भरकम प्रोजेक्ट में पहली ही बार में इस तरह की लापरवाही ने बड़े भ्रष्टाचार की आशंका को जन्म दे दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि इतने बड़े हादसे और करोड़ों की सरकारी राशि की बर्बादी के बाद भी मध्य प्रदेश सेतु निर्माण निगम के अधिकारी मामले को दबाने में लगे हैं। आरोप यह भी हैं कि विभाग के आला अफसर तकनीकी खामी का बहाना बनाकर दोषी ठेकेदार को क्लीन चिट देने और उसे बचाने का ताना-बाना बुन रहे हैं।
​बड़ा सवाल: अगर पहली ही गर्डर लॉन्चिंग में पुल का यह हाल है, तो भविष्य में इस पर से गुजरने वाले हजारों ग्रामीणों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? क्या शासन इस मामले की निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच कराएगा या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

ब्रिज में उपयोग हो रही कही ब्रिज में मापदंड से निचले स्तर की सीमेंट तो उपयोग नहीं हो रही…?
पुल (Bridge) बनाने में इस्तेमाल होने वाली सीमेंट और कंक्रीट, आम घरों में इस्तेमाल होने वाले सीमेंट से काफी अलग और बहुत अधिक मजबूत होती है।
​पुलों पर हजारों टन वजन, गाड़ियों का कंपन, पानी का बहाव और मौसम का भारी दबाव होता है। इसलिए, इसके निर्माण में हाई-ग्रेड सीमेंट और विशेष कंक्रीट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है।
​इसके बारे में मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:
​1. सीमेंट का ग्रेड (Grade of Cement)
​आम तौर पर घरों के निर्माण में 33 या 43 ग्रेड (OPC – Ordinary Portland Cement) या PPC (Pozzolana Portland Cement) का इस्तेमाल होता है। लेकिन पुलों के मुख्य हिस्सों (जैसे पिलर और बीम) के लिए:
​53 ग्रेड सीमेंट या उससे भी उन्नत विशेष सीमेंट का उपयोग किया जाता है।
​यह ग्रेड सीमेंट की कंप्रेसिव स्ट्रेंथ (सहनशक्ति) को दर्शाता है। 53 ग्रेड का मतलब है कि 28 दिनों के बाद यह न्यूनतम 53\text{ N/mm}^2 (न्यूटन प्रति वर्ग मिलीमीटर) का दबाव झेल सकती है।
​2. कंक्रीट का हाई-ग्रेड (High-Performance Concrete)
​सिर्फ सीमेंट ही नहीं, बल्कि जो कंक्रीट (सीमेंट, रेत, गिट्टी और पानी का मिश्रण) पुल के लिए तैयार होती है, उसका ग्रेड बहुत ऊंचा होता है:
​सामान्य घरों के लिए: M20 या M25 ग्रेड का कंक्रीट इस्तेमाल होता है।
​पुलों के लिए: M40, M50, M60 या इससे भी ऊपर के ग्रेड का कंक्रीट इस्तेमाल किया जाता है। (यहाँ ‘M’ का मतलब Mix है और संख्या उसकी मजबूती बताती है)।
​यह आम सीमेंट से बेहतर और अलग क्यों होती है?
​तेजी से मजबूती पकड़ना (High Early Strength): पुलों के काम में ‘प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट’ (Pre-stressed Concrete) का इस्तेमाल होता है। इसमें ऐसी सीमेंट चाहिए होती है जो बहुत कम दिनों में ही अपनी पूरी मजबूती हासिल कर ले, ताकि भारी गर्डर्स को संभाला जा सके।
​कम गर्मी पैदा करना (Low Heat of Hydration): जब सीमेंट में पानी मिलता है, तो रासायनिक क्रिया के कारण गर्मी (Heat) निकलती है। पुल के पिलर बहुत मोटे और भारी होते हैं। अगर ज्यादा गर्मी निकलेगी, तो कंक्रीट के अंदर दरारें (Cracks) आ सकती हैं। इसलिए पुलों के लिए Low Heat Cement का इस्तेमाल किया जाता है।
​पानी और रसायनों से सुरक्षा: पुल का निचला हिस्सा हमेशा पानी या नमी में रहता है। इस सीमेंट की बनावट ऐसी होती है कि इसमें बारीक छेद (Porosity) न के बराबर होते हैं। इससे पानी या नदी के केमिकल पुल के अंदरूनी सरिए (Steel) तक नहीं पहुँच पाते और जंग लगने का खतरा खत्म हो जाता है।
​एडमिक्सचर्स (Admixtures) का कमाल
​इस सीमेंट और कंक्रीट की ताकत को और बढ़ाने के लिए इसमें कुछ विशेष केमिकल (Admixtures) मिलाए जाते हैं, जैसे सुपरप्लास्टिसाइज़र (Superplasticizers) और सिलिका फ्यूम (Silica Fume)। ये कंक्रीट को इतना घना और मजबूत बना देते हैं कि वह चट्टान जैसी ठोस हो जाती है।
​संक्षेप में कहें तो, पुल बनाने वाली सीमेंट को खास तौर पर सैकड़ों सालों की उम्र, भारी वजन और प्राकृतिक आपदाओं (जैसे भूकंप और बाढ़) को झेलने के लिए ही लैब में टेस्ट करके तैयार किया जाता है।

जांच के बिंदु

  1. कंक्रीट की ताकत जांचने के मुख्य टेस्ट
    ​पुल के निर्माण के दौरान कंक्रीट का मिक्सर तैयार होते ही उसकी टेस्टिंग शुरू हो जाती है। इसके लिए मुख्य रूप से दो टेस्ट सबसे महत्वपूर्ण हैं:
    ​कंक्रीट कंप्रेसिव स्ट्रेंथ टेस्ट (Cube Test)
    ​यह क्या है?: कंक्रीट डलते समय उसके 150\text{ mm} \times 150\text{ mm} \times 150\text{ mm} के आकार के क्यूब्स (मॉक ब्लॉक) भरे जाते हैं।
    ​जांच: इन क्यूब्स को पानी में तराई (Curing) के लिए रखा जाता है और फिर 7 दिन एवं 28 दिन के बाद Compression Testing Machine (CTM) में रखकर तब तक दबाया जाता है जब तक कि वे टूट न जाएं।
    ​मानक: अगर कंक्रीट M50 ग्रेड का है, तो 28 दिन बाद उसकी मजबूती 50\text{ N/mm}^2 से अधिक आनी ही चाहिए। अगर यह कम आती है, तो पूरा स्ट्रक्चर रिजेक्ट कर दिया जाता है।
    ​स्लम्प कोन टेस्ट (Slump Cone Test)
    ​यह क्या है?: यह कंक्रीट की ‘वर्कएबिलिटी’ (Workability) यानी उसके गाढ़ेपन और बहने की क्षमता को मापता है।
    ​महत्व: पुलों में सरिया बहुत घना (Dense Rebar) होता है। अगर कंक्रीट ज्यादा सूखा होगा, तो वह सरिए के बीच में ठीक से नहीं भरेगा और अंदर खोखलापन (Honeycombing) रह जाएगा, जिससे पुल कमजोर हो सकता है।
    ​2. कंक्रीट के अंदर की कमजोरी पकड़ने वाले टेस्ट (NDT)
    ​कई बार कंक्रीट सूखने के बाद ऊपर से तो ठीक दिखता है, लेकिन उसके अंदर दरारें या हवा के बुलबुले (Voids) रह जाते हैं। इन्हें पकड़ने के लिए Non-Destructive Testing (NDT) यानी बिना तोड़े की जाने वाली जांचें होती हैं:
    ​अल्ट्रासोनिक पल्स वेलोसिटी टेस्ट (UPV): इसमें कंक्रीट के आर-पार अल्ट्रासोनिक (ध्वनि) तरंगें भेजी जाती हैं। अगर तरंगें तेजी से पार हो जाएं, तो कंक्रीट ठोस है। अगर बीच में दरार या खोखलापन होगा, तो तरंगों की गति धीमी हो जाएगी।
    ​रिबाउंड हैमर टेस्ट (Rebound Hammer Test): यह एक स्प्रिंग-लोडेड हैमर होता है जिसे कंक्रीट की सतह पर मारकर उसकी ऊपरी कठोरता (Surface Hardness) तुरंत नापी जाती है।
    ​3. प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट (Pre-stressed Concrete) और गर्डर लॉन्चिंग
    ​आपने अपने लेख में ‘गर्डर लॉन्चिंग’ और ‘प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट’ का जिक्र किया। पुलों के लंबे स्पैन (दो पिलर के बीच की दूरी) को संभालने के लिए यह तकनीक जादू की तरह काम करती है:
    ​यह कैसे काम करती है?: कंक्रीट की एक कमजोरी होती है—यह दबाने पर बहुत मजबूत होती है (Compression), लेकिन खींचने पर तुरंत टूट जाती है (Tension)। पुल के गर्डर पर जब भारी ट्रक गुजरते हैं, तो वह नीचे की तरफ झुकना चाहता है, जिससे उसमें ‘टेंशन’ पैदा होता है।
    ​तकनीक: इसे रोकने के लिए, कंक्रीट की बीम के अंदर हाई-स्ट्रेंथ स्टील के मोटे केबल्स (Tendons) डाले जाते हैं। कंक्रीट के सूखने के बाद इन केबल्स को हाइड्रोलिक जैक से लाखों न्यूटन के बल से खींचा जाता है और दोनों सिरों पर लॉक कर दिया जाता है।
    ​नतीजा: इससे कंक्रीट की बीम पहले से ही अंदरूनी दबाव (Pre-compression) में आ जाती है। जब इस पर भारी वजन आता है, तो यह कंक्रीट को बेअसर कर देता है और पुल टस से मस नहीं होता।
    ​💡 बड़गान हादसे का तकनीकी कारण क्या हो सकता है?
    जैसा कि बड़गान के मामले में सामने आया कि “लॉन्चिंग के दौरान बीम बीच से टूट गई और तराई की चोरी हुई”, सिविल इंजीनियरिंग के नजरिए से इसके दो बड़े कारण हो सकते हैं:
    ​तराई की कमी (Poor Curing): हाई-ग्रेड सीमेंट (53 Grade) को हाइड्रेशन के लिए बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है। अगर शुरुआती 7-14 दिनों तक लगातार तराई न की जाए, तो कंक्रीट अपनी तय मजबूती का 50% भी हासिल नहीं कर पाता।
    ​गलत प्री-स्ट्रेसिंग या समय से पहले लॉन्चिंग: यदि केबल्स को सही तनाव (Tension) नहीं दिया गया या कंक्रीट के पूरी तरह से मजबूत (28 दिन का समय) होने से पहले ही उसे क्रेन से उठा लिया गया, तो कंक्रीट खुद का वजन भी नहीं संभाल पाता और बीच से क्रैक हो जाता है।
Yogesh Soni Editor
Yogesh Soni Editorhttp://khabaronkiduniya.com
पत्रकारिता मेरे जीवन का एक मिशन है,जो बतौर ए शौक शुरू हुआ लेकिन अब मेरा धर्म और कर्म बन गया है।जनहित की हर बात जिम्मेदारों तक पहुंचाना,दुनिया भर की वह खबरों के अनछुए पहलू आप तक पहुंचाना मूल उद्देश्य है।
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