चाय की चुस्की और बारिश की फुहारों के बीच जब प्यारे मोहन जैसा ‘दार्शनिक’ मित्र साथ हो, तो चर्चा का ‘थर्मोमीटर’ गर्म होना लाजिमी है।
आज मौसम सुहाना था, आसमान से बूंदें गिर रही थीं और हम सागर रोड पर सड़क किनारे एक छपरी के नीचे ‘कटिंग चाय’ का आनंद ले रहे थे। तभी हमारे परम मित्र प्यारे मोहन ने कुल्हड़ को होठों से लगाते हुए एक ऐसा दार्शनिक बम फोड़ा कि हमारी चाय का स्वाद ही बदल गया।
प्यारे मोहन ने आसमान की तरफ देखा, फिर छपरी से टपकती एक बूंद को अपने कुर्ते पर झेलते हुए बोले, “भाई साहब, इस देश में जरूरत मर चुकी है और उसकी जगह ‘दिखावे’ का जन्म हो चुका है। अब जरा आम आदमी की प्रायोरिटी (प्राथमिकता) देखिए। घर की छत टपक रही है, बर्तन भरे जा रहे हैं, लेकिन बंदा बरसात में भीगते हुए भी ₹50,000 के नए चमचमाते स्मार्टफोन पर ‘EMI का स्टेटस’ चेक कर रहा है। छत की मरम्मत अगले साल हो जाएगी, लेकिन रील पर फिल्टर आज ही लगना जरूरी है!”
बात में दम था। प्यारे मोहन यहीं नहीं रुके। उन्होंने अपनी उंगली सीधे देश की ‘शीर्ष राजनीति’ की तरफ घुमा दी। बोले, “और यही हाल ऊपर भी है,आज लोगो को गड्ढा मुक्त सड़कें और रोजगार चाहिए, लेकिन हुक्मरान उन मुद्दों का ‘बुफे’ सजाए बैठे हैं जो शायद पचास साल बाद काम आएं। आज अस्पताल में स्ट्रेचर नहीं है, लेकिन चर्चा बुलेट ट्रेन के रूट पर हो रही है। आज की भूख का इलाज नहीं है, लेकिन डिजिटल इंडिया के कल की चमक बेजोड़ है।”
प्यारे मोहन का यह ‘चाय पे ज्ञान’ सीधे दिल पर लगा। बात सौ फीसदी जायज थी और मेरे पास कोई जवाब नहीं था। निरुत्तर होने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि खुद मैं भी उसी ‘फैशन की बारिश’ में भीगा हुआ था।
मेरी जेब में रखा फोन अभी दो महीने पहले ही ‘नो-कॉस्ट EMI’ पर आया था, जिसकी किस्तें चुकाने में मेरे खुद के पसीने छूट रहे थे। घर की जिस दीवार की सीलन को देखकर मैं रोज नजरें चुराता हूँ, उसी दीवार के सामने खड़े होकर कल ही मैंने एक ‘महंगा’ सेल्फी स्टैंड सेट किया था।
आज का मानव और आज की राजनीति, दोनों एक ही नाव पर सवार हैं। दोनों को ‘यथार्थ’ की फटी जेब मंजूर है, बशर्ते ऊपर से ‘ठाठ-बाट’ का मखमली कोट होना चाहिए। जेब भले ही खाली हो, कर्ज का बोझ गर्दन तक आ जाए, लेकिन ‘टशन’ में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
मैंने प्यारे मोहन की तरफ देखा, चाय का आखिरी घूंट भरा और मन ही मन कहा— “मोहन, सच मत बोला करो! इस फैशन के दौर में सच सुनना भी वैसा ही है, जैसे बिना वाटरप्रूफ कवर के बारिश में महंगा मोबाइल बाहर निकालना… रिस्क बहुत ज्यादा है!”
राधे राधे🙏
@highlight Nagar Palika Rehli Devraj Soni #follower Rajneesh Jain Ashish Dwivedi #everyone #followme
चाय की चुस्की, टपकती छत और ‘स्मार्ट’ कर्ज का फैशन……
इस देश में जरूरत मर चुकी है और उसकी जगह 'दिखावे' का जन्म हो चुका है। अब जरा आम आदमी की प्रायोरिटी (प्राथमिकता) देखिए। घर की छत टपक रही है, बर्तन भरे जा रहे हैं, लेकिन बंदा बरसात में भीगते हुए भी ₹50,000 के नए चमचमाते स्मार्टफोन पर 'EMI का स्टेटस' चेक कर रहा है। छत की मरम्मत अगले साल हो जाएगी, लेकिन रील पर फिल्टर आज ही लगना जरूरी है!"
RELATED ARTICLES
