पहले दो दर्जन से अधिक टोलियां, अब चार-पांच शेरों में सिमटती परंपरा | क्या मोबाइल की दुनिया निगल रही है बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत?
कभी शारदीय नवरात्र आते ही बुंदेलखंड के देवी पंडालों में शेरों की दहाड़ और विशेष धुन पर बजते बाजों की गूंज सुनाई देने लगती थी। देवी आराधना की इस अनूठी बुंदेली शैली में शेर बनकर निकलने वाली टोलियां एक पंडाल से दूसरे पंडाल तक पहुंचती थीं। ढोल-बाजों की लय पर शेरों का नृत्य श्रद्धा, उत्साह और लोक संस्कृति का ऐसा संगम प्रस्तुत करता था, जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी।
लेकिन इस बार नवरात्र में कुछ ऐसा नजर आया, जिसने बुंदेलखंड की इस पारंपरिक कला के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शेर नृत्य करने वाली टोलियों की संख्या में कमी दिखाई दी। जो परंपरा कभी दर्जनों टोलियों के साथ नगर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती थी, वह अब सिमटती नजर आ रही है।
कभी दर्जनों शेरों से गुलजार रहते थे देवी पंडाल
बुंदेलखंड में शारदीय नवरात्र के दौरान शेर बनकर देवी पंडालों में नृत्य करना महज मनोरंजन नहीं, बल्कि देवी आराधना की एक विशिष्ट लोक परंपरा है। इसमें कलाकार विशेष वेशभूषा धारण कर शेर का रूप लेते हैं और पारंपरिक धुन पर नृत्य करते हुए विभिन्न देवी पंडालों में पहुंचते हैं।
एक समय था, जब एक टोली में दर्जनों लोग शेर बनकर निकलते थे। नगर में दो दर्जन से अधिक टोलियां सक्रिय रहती थीं। हर टोली का अपना उत्साह और अपना अंदाज होता था। देवी पंडालों में इन टोलियों का पहुंचना नवरात्र के उल्लास को और बढ़ा देता था।
लेकिन समय के साथ तस्वीर बदलने लगी। पहले टोलियों की संख्या कम हुई और अब बची हुई टोलियों में भी शेरों की संख्या घटती दिखाई दे रही है। इस बार कई जगह चार-पांच लोगों की टोली ही इस परंपरा को निभाती नजर आई।
आखिर क्यों कम हो रहे हैं बुंदेलखंड के शेर?
इस परंपरा में आई गिरावट के वास्तविक कारणों की विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए किसी एक वजह को इसका जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। हालांकि, बदलती जीवनशैली, नई पीढ़ी की बदलती रुचियां और मोबाइल में सिमटती दुनिया जैसे पहलुओं पर विचार करना जरूरी है।
आज मनोरंजन के साधन बदल गए हैं। युवाओं का समय मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन में अधिक बीत रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पारंपरिक लोक कलाओं से नई पीढ़ी का जुड़ाव कमजोर हो रहा है?
यदि ऐसा है, तो यह केवल शेर नृत्य तक सीमित चिंता नहीं है। यह उस सांस्कृतिक विरासत के भविष्य का सवाल है, जिसे पीढ़ियों ने अपने उत्साह, समर्पण और सहभागिता से जीवित रखा है।
क्योंकि जब किसी संस्कृति की परंपराएं कम होने लगती हैं, तो केवल कलाकार नहीं घटते—उस संस्कृति की एक पूरी पहचान भी धीरे-धीरे ओझल होने लगती है।
