कृपालु जी महाराज और रमेश बाबा के बीच बरसाना में कैसी आत्मीयता थी?
बरसाना की गलियों में आज भी सुनाई देती है उस आध्यात्मिक जुड़ाव की कहानी…

ब्रजभूमि केवल माटी नहीं, भाव और भक्ति का वो महासागर है जहाँ हर संत की साधना राधारानी के चरणों में समर्पित होती है। अध्यात्म जगत और ब्रज-वृंदावन से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने बरसाना के लाडले संत पूज्य रमेश बाबा जी का नाम न सुना हो। लाखों गोवंश को आश्रय देने वाली विशाल माताजी गोशाला और ब्रज के अनेक लुप्त लीला-स्थलों के जीर्णोद्धार के लिए उनका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो चुका है।
जीवन में कई बार हम संतों के दर्शन की अभिलाषा तो संजोते हैं, पर सांसारिक उलझनों और ढिलाई के कारण समय हाथ से फिसल जाता है। पूज्य सद्गुरुदेव प्रेमानंद जी महाराज और संत विनोद बाबा के दर्शन का सौभाग्य तो मिला, लेकिन रमेश बाबा के श्रीचरणों में शीश नवा कर आशीर्वाद पाने की लालसा अधूरी ही रह गई।
बरसाना की एक मिष्ठान की दुकान से जुड़ी स्मृति इस कहानी को और भावुक बना देती है। दुकानदार द्वारा सुनाया गया वह प्रसंग सिर्फ दो संतों की मुलाकात की कहानी नहीं, बल्कि बरसाना की संत परंपरा, श्रद्धा और आत्मीयता की झलक देता है।
बरसाना की एक पावन स्मृति आज भी हृदय में जीवंत है। एक दिन बरसाना में रंगीली गली को प्रसिद्दुध मिठाई दुकान कुकी मिष्ठान से मिठाई लेते समय दुकानदार कुकी शर्मा से जब सहज ही बात छिड़ी, तो दुकानदार ने ब्रज के इतिहास का एक ऐसा अद्भुत अध्याय खोला जिसे कम ही लोग जानते हैं। उन्होंने बताया कि जगद्गुरु कृपालु जी महाराज और संत रमेश बाबा एक ही समय बरसाना पधारे थे। दोनों महानुभावों ने लाडली जी (श्री राधारानी) के निज महल में अनन्य भाव से सेवा की। राधारानी की कृपा का फल दोनों संतों को अलग-अलग मार्गों से मिला—कृपालु जी महाराज ने वृंदावन को कर्मभूमि बनाकर विश्वप्रसिद्ध ‘प्रेम मंदिर’ और बरसाना में अलौकिक ‘कीर्ति मंदिर’ का निर्माण कराया, जो आज पूरी दुनिया के लिए आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र हैं। वहीं दूसरी ओर, रमेश बाबा ने बरसाने को ही अपनी साधना स्थली बनाया और श्रीजी की प्रेरणा से गो-सेवा को ही अपना सर्वोच्च धर्म मान लिया।
यह रहस्य जानकर मन में बाबा के दर्शन की उत्सुकता और अधिक गहरा गई थी। सोचा था कि अगली बार जब बरसाना आना होगा, तो बाबा के श्रीचरणों में बैठकर उनका आशीर्वाद अवश्य लूँगा। लेकिन विधि का विधान कुछ और ही था। हर बार कोई न कोई कारण बनता गया, तारीखें टलती रहीं और दर्शन की तारीख कभी आ ही नहीं पाई।
और फिर एक दिन समाचार आया कि संत रमेश बाबा ने अपनी भौतिक लीला समेट ली है और श्री राधारानी के नित्य निकुंज धाम में लीन हो गए हैं।
हृदय एक अजीब से खालीपन और पछतावे से भर गया—“अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।”
लेकिन इस अधूरी मुलाकात ने जीवन का सबसे बड़ा पाठ सिखा दिया: ‘सत्कर्म, धर्म-लाभ और संतों के दर्शन में कभी विलंब नहीं करना चाहिए।’ कल की आस में आज के पुण्य को टालना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल होती है। संत तो जलती हुई धूप में बरगद की छाँव की तरह होते हैं, कब अपनी लीला समेट लें, कोई नहीं जानता।
बाबा अब हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन बरसाना के हर लीला-स्थल, गोशाला की हर गाय की पुकार और ब्रज की रज-रज में उनका गो-सेवा का संकल्प सदैव अमर रहेगा।
श्री रमेश बाबा जी के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन।
जय-जय श्री राधे! 🙏
