रहली। आधुनिकता के इस दौर में भले ही पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे दम तोड़ रही हों, लेकिन रहली तहसील के छोटे से गांव काछी पिपरिया में 209 साल पुरानी एक अनोखी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा आज भी पूरी शान से कायम है। भाद्रपद माह की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला यह मेला पूरे क्षेत्र में “पुतरियों के मेले” के नाम से विख्यात है।
1,000 मूर्तियों का संग्रहालय और सजीव झांकियां
इस ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत करीब 209 वर्ष पूर्व गांव के स्व. श्री दुर्गाप्रसाद पांडेय जी ने की थी। वे मूर्तिकला और चित्रकला में बेहद पारंगत थे। प्राचीन काल में शिक्षा और संसाधनों के अभाव को देखते हुए उन्होंने धर्मजागरण के लिए मूर्तियों और चित्रों का सहारा लिया। उन्होंने लगभग एक हजार हस्तनिर्मित मूर्तियों का निर्माण कर अपने निवास को एक जीवंत संग्रहालय के रूप में विकसित किया, जहां श्रीकृष्ण लीलाओं की सजीव झांकियां सजाई जाती हैं।
चार पीढ़ियों का अटूट समर्पण
पांडेय परिवार की चौथी पीढ़ी आज भी इस विरासत को पूरे उत्साह और शिद्दत के साथ संजोए हुए है। स्व. दुर्गाप्रसाद पांडेय के बाद उनके पुत्र स्व. बैजनाथ प्रसाद पांडेय, तत्पश्चात तीसरी पीढ़ी के श्री जगदीश प्रसाद पांडेय ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्तमान में पवन पांडेय, रामकृष्ण, मनोज, ललित, रमाकांत, श्याम सुंदर और उनकी नई पीढ़ी के बच्चे (अतुल, जय, ओम, पार्थ, दक्ष, श्रेया) मिलकर मेला शुरू होने के 10 दिन पहले से ही हस्तनिर्मित झांकियों की तैयारियों में जुट जाते हैं।
बिना किसी सरकारी मदद के दे रहे सामाजिक संदेश
पांडेय परिवार बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के, पूरी तरह से अपने स्वयं के खर्च और परिश्रम से इस आयोजन को सतत जारी रखे हुए है। झांकियों के माध्यम से धर्मजागरण के साथ-साथ समाज को व्यसनमुक्ति और गौ-पालन का पुण्य संदेश भी दिया जाता है। यद्यपि डिजिटल युग में मेलों के प्रति लोगों का आकर्षण कम हुआ है, फिर भी पांडेय परिवार इस अनूठी परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक सतत जारी रखने के लिए पूरी तरह संकल्पबद्ध है।
