मप्र। बीती रात मौसम के बदले मिजाज के साथ हुई तेज गरज-चमक और झमाझम बारिश के बीच एक बड़ा हादसा सामने आया है। सागर जिले के रहली नगर के वार्ड क्रमांक 10 स्थित गायत्री मंदिर के पीछे, आकाशीय बिजली lighting (जिसे स्थानीय बुंदेलखंडी भाषा में ‘गाज’ भी कहा जाता है) गिरने से भारी नुकसान हुआ है। बिजली सीधे हर्ष विश्वकर्मा के लकड़ी के कारखाने पर गिरी, जिससे कारखाने का मजबूत छप्पर ताश के पत्तों की तरह धराशायी हो गया। गनीमत रही कि हादसा रात के वक्त हुआ जब कारखाने में कोई मौजूद नहीं था, जिससे एक बड़ा जनहानि का खतरा टल गया।
शहरी इलाकों में क्यों दुर्लभ है गाज गिरना?
आमतौर पर देखा गया है कि आकाशीय बिजली घने रिहायशी इलाकों या मकानों पर कम ही गिरती है। यह ज्यादातर खुले मैदानों, ऊंचे पेड़ों या एकांत में बने बड़े भवनों को अपना शिकार बनाती है।
विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों के मुताबिक, यदि कभी बिजली शहर या नगर के भीतर गिरती भी है, तो अमूमन वह बिजली के खंभों के माध्यम से जमीन में समाहित (अर्थ हो) जाती है।
लोहे के खंभे हटने से बढ़ा खतरा?
विज्ञान के नियम के अनुसार, लोहा और अन्य धातुएं बिजली को अपनी ओर तेजी से आकर्षित करती हैं।
- पहले की व्यवस्था: पहले बिजली विभागों द्वारा लोहे के खंभों का इस्तेमाल किया जाता था, जो एक तरह से लाइटनिंग अरेस्टर (तड़ित चालक) का काम कर जाते थे और बिजली को सीधे जमीन में खींच लेते थे।
- वर्तमान स्थिति: समय के साथ सरकार और बिजली कंपनी ने सुरक्षा और टिकाऊपन के लिहाज से सीमेंट के खंभों (Concrete Poles) का उपयोग शुरू कर दिया है।
