आज़ादी के गुमनाम नायक: चंद्रशेखर आज़ाद के वे ‘पुत्र समान’ साथी, जिन्होंने जीवन भर निभाई वफ़ादारी
चंद्रशेखर आज़ाद के इन दोनों साथियों का इतिहास बहुत प्रेरक है। आज़ाद की शहादत के बाद उन्होंने उनकी वृद्ध माता जगरानी देवी की सगे बेटे की तरह सेवा की। वहीं उनके बड़े भाई शंकर राव मलकापुरकर और उनकी पत्नी शांता ताई ने भी इस काम में उनका पूरा साथ दिया।
क्रांति की राह में सदाशिवराव मलकापुरकर और उनके भाई शंकर राव की कहानी, जिन्होंने आज़ाद के बलिदान के बाद उनकी बुजुर्ग मां को सहारा दिया।
जब भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात होती है, तो महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद का नाम सबसे पहले याद किया जाता है। लेकिन इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे पन्नों की चमक थोड़ी धुंधली पड़ गई है, जिन्होंने न केवल आज़ादी की लड़ाई में अपना जीवन न्योछावर किया, बल्कि आज़ादी मिलने के बाद भी मानवीय और नैतिक मूल्यों की ऐसी मिसाल पेश की जो दुर्लभ है

ऐसे ही दो नाम हैं— सदाशिवराव मलकापुरकर और उनके भाई शंकर राव मलकापुरकर।
क्रांतिकारी दल के विश्वसनीय स्तंभ: सदाशिवराव मलकापुरकर
मध्य प्रदेश के सागर (रहली तहसील) के एक जमींदार परिवार में जन्मे सदाशिवराव मलकापुरकर जब उच्च शिक्षा के लिए झांसी पहुंचे, तो वे मास्टर रुद्रनारायण, भगवानदास माहौर और विश्वनाथ वैशंपायन के संपर्क में आए। यहीं से उनकी मुलाकात चंद्रशेखर आज़ाद से हुई।
सदाशिवराव जल्द ही हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के मुख्य कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए। वे पढ़ाई के साथ-साथ झाँसी के जंगलों में आज़ाद के साथ बम बनाने और निशानेबाज़ी का अभ्यास करते थे। क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के कारण उन्हें प्रसिद्ध ‘भुसावल बम कांड’ में गिरफ्तार किया गया
आज़ाद को दिया वचन और मां जगरानी देवी की सेवा
27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत हो गई। जेल से रिहा होने के बाद जब सदाशिवराव मलकापुरकर को पता चला कि आज़ाद के जाने के बाद उनकी वृद्ध माता जगरानी देवी अत्यंत गरीबी और गुरबत में जीवन जी रही हैं, तो उनकी आंखें नम हो गईं।
सदाशिवराव ने इसे अपना नैतिक कर्तव्य समझा। वे आज़ाद के गांव भाबरा पहुंचे और उनकी मां को अपने साथ झाँसी ले आए। उन्होंने एक सगे बेटे की तरह उनकी देखभाल की।
भाई शंकर राव और भाभी शांता ताई का ऐतिहासिक योगदान
इस पुनीत कार्य में सदाशिवराव अकेले नहीं थे। उनके बड़े भाई शंकर राव मलकापुरकर और उनकी पत्नी शांता ताई ने भी देशभक्ति की अनूठी मिसाल पेश की।
जब शंकर राव और उनकी पत्नी को पता चला कि उनके छोटे देवर सदाशिव चंद्रशेखर आज़ाद की मां को झाँसी ले आए हैं, तो वे दोनों भी झाँसी आ गए। शांता ताई ने एक समर्पित बहू की तरह जगरानी देवी की सेवा की और शंकर राव मलकापुरकर ने पारिवारिक व आर्थिक संबल प्रदान किया। वर्ष 1949 में वे जगरानी देवी को देश के विभिन्न तीर्थों की यात्रा पर भी ले गए।
अंतिम सांस तक निभाई रिश्ते की गरिमा
23 मार्च 1951 को चंद्रशेखर आज़ाद की मां जगरानी देवी का झाँसी में देहावसान हो गया। सदाशिवराव मलकापुरकर ने एक बेटे की भांति उनका अंतिम संस्कार किया और मुखाग्नि दी। झाँसी के बड़ागांव गेट के बाहर आज भी आज़ाद की मां की समाधि स्थित है, जो मलकापुरकर परिवार के इस निस्वार्थ त्याग की गवाही देती है।
निष्कर्ष
आज़ादी केवल बंदूक उठाने या जेल जाने का नाम नहीं थी, बल्कि अपने साथियों के परिवारों की जिम्मेदारी उठाने और नैतिक मूल्यों को जीवन भर निभाने का नाम भी थी। सदाशिवराव मलकापुरकर, शंकर राव मलकापुरकर और उनका पूरा परिवार स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अपनी इसी निष्ठा और सेवाभाव के लिए हमेशा अमर रहेगा।
