
स्पष्ट है कि मैं हनुमानजी महाराज की प्रतिमा शिफ्टिंग के ख़िलाफ़ होता। न कि निगम के मंदिर ध्वस्तीकरण और हनुमान प्रतिमा हटाए जाने के प्रकरण को चमत्कारिक रूप से चासनी के तौर पर घोलकर दिखाता। मेरी एक लाइन होती कि – सड़क चौड़ीकरण के अन्य विकल्प हो सकते हैं। हनुमान मंदिर को बाधा के तौर पर देखना, ये आस्था का घोर अपमान है।
—• हनुमानजी भारतीय संस्कृति के केंद्र बिंदु हैं। लोक आस्था हैं। समाज के आदर्श हैं। उज्जैन में उनकी ये सैकड़ों साल पुरानी प्रतिमा भारतीय समाज की अमर चेतना का प्रतिबिम्ब है। ऐसे में मैं समाज को ये बताता कि – ये सिर्फ़ मंदिर ध्वस्तीकरण, प्रतिमा की शिफ्टिंग नहीं है। बल्कि सहिष्णु समाज की आस्था के साथ खिलवाड़ है।
—•ये लालफीताशाही और एसी केबिन में बैठकर बनाए गए इवेंट मैनेजमेंट की भर्रेशाही का दुष्परिणाम है। अन्यथा सिंहस्थ 2028 के लिए सड़क चौड़ीकरण के नाम पर कई पीढ़ियों के तप और उनकी आस्था को चुनौती देने का दुस्साहस कोई कैसे कर सकता? क्योंकि चौड़ी सड़क किसलिए बनाई जा रही है? सिंहस्थ-2028 के पर्व के लिए न?
फिर – सिंहस्थ किसलिए है?
— आस्था, भक्ति और सांस्कृतिक बोध को जन-जन तक पहुंचाने के लिए। किन्तु मंदिर को हटाकर क्या संदेश जाएगा? सड़कें कहीं भी बन सकती हैं। लेकिन सैकड़ों सालों से बने श्रद्धा केंद्र अगर हटते हैं तो ये हमारे पुरखों, कई पीढ़ियों के तप को नष्ट करने जैसा है। हमारे सांस्कृतिक अस्तित्व को मिटाने जैसा है। क्योंकि लग्जरी के नाम पर इनका पुनर्निर्माण नहीं किया जा सकता है। न हमारा अतीत लौटाया जा सकता है।
—दूजे उज्जैन में अगर हनुमानजी महाराज की प्रतिमा हटी तो कल को हर जगह के लिए उदाहरण स्थापित होगा कि – सेक्युलर अनीतियां हिन्दू आस्था को अपमानित करती रहेंगी। हमारे तीर्थ स्थान, पर्यटन स्थान बन जाने के लिए अभिशप्त हो जाएंगे। फिर जहां पर्यटन आता है वहां ‘तीर्थ’ की दुर्गति हो जाती है। उदाहरण के लिए जिन-जिन तीर्थस्थलों में पर्यटन हावी हुआ, वहां समय-समय पर आई त्रासदियां बताती हैं कि – हमारे देव-कुपित हैं। इसी को कहते हैं कि ईश्वर की लाठी में आवाज़ नहीं होती है। क्योंकि तीर्थस्थलों में उतनी ही भौतिक सुविधाएं शोभा देती हैं जिससे श्रद्धालुओं को आवागमन, दर्शन में सुविधा हो। बाक़ी हमारे तीर्थ स्थलों को पर्यटन स्थल न बनाइए।
—•मैं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री Dr Mohan Yadav तक ये संदेश भिजवाता कि – मुख्यमंत्री जी ये कार्य आपकी धर्मनिष्ठा के विरोध में है। ये उज्जैन की सांस्कृतिक अन्तश्चेतना के ख़िलाफ़ है। ये ऐतिहासिक जीवन मूल्यों आदर्शों, परंपराओं और आस्था के मानबिन्दुओं पर कुठाराघात है। हो सकता है कि लोकमानस सत्ता और प्रशासन की हनक के आगे तात्कालिक मौन धारण किए रहे । किन्तु समाज लंबे समय तक कभी भी मौन नहीं रहता है। ऐसे में जिसने भी ये मसौदा तैयार किया है। उसे आप त्वरित ख़ारिज़ कीजिए। मंदिर को दोबारा भव्य स्वरूप दीजिए। वैकल्पिक रास्ते के विषय में विचार करना चाहिए। इससे सुंदर और कुछ नहीं हो सकता है।
—• समाज को मैं यही कहता कि – हे! ऋषि संतानों जागिए।समाज नीति पर राजनीति को हावी मत होने दीजिए। क्योंकि ये धिम्मीपना, समाज को जर्जर बना देगा। पर्यटन और लग्ज़री सुविधाओं के नज़रिए से देखने वाली व्यवस्था को ‘आस्था’ और मानबिन्दु केवल ‘बिजनेस’ के रूप में दिखते हैं। ऐसे में समाज को अपना स्टैंड लेना ही पड़ेगा। क्योंकि अगर कल को आपके बच्चे पूछेंगे कि – खड़े हनुमानजी का मंदिर क्यों नष्ट हुआ? खड़े हनुमानजी को सरकारी व्यवस्था ने क्यों शिफ्ट किया? उस समय आप क्या कर रहे थे?
— ऐसे में आपका ज़वाब क्या होगा? शर्म से सिर झुका लेने के अलावा? जागिए जी…
— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
( साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)
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