Saturday, April 25, 2026
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बुढ़ापा बन सकता हे ब्यूटी… जाने कैसे..?

चेहरा तो पोत लोगो पर हिम्मत कहां से लाओगे

आज प्यारे मोहन राजनीति छोड़ आध्यात्मिक दशा में चिंतन करते मिले,बोले अधिकतर लोग जवानी को जीवन का सबसे सुंदर समय मानते हे,कुछ बचपन को तो कुछ कालेज टाइम को।सबके अलग मत हे।पर बुढ़ापे को आज तक किसी ने सुंदर नहीं बताया,जबकि वह जीवन का शिखर हे,और सबसे खूबसूरत तो यही होना चाहिए,अथवा बनाया जा सकता हे।
इस तरह के सवाल को सुन सकपका गया।बुढ़ापा और सुंदर हो,, जब झुर्रियां चेहरे पर,हाथ में छड़ी,हिम्मत का दूर दूर तक पता नहीं,,, कोई ब्यूटीपार्लर भी नहीं जो बुढ़ापे को सुंदर बना दे,चेहरा पोत सकता हे,पर हिम्मत कहां से लाओगे,,,,,आज तक ऐसे किसी विषय से सामना नहीं हुआ तो अचंभा हुआ,मैने कहा तुम्हारे सवाल ने तो प्यारे ला जवाब कर दिया,कुछ समय दो कही ना कही जवाब जरूर मिलेगा।

अकसर हम बचपन की मासूमियत और जवानी के जोश को ही जीवन का ‘स्वर्ण काल’ मानते हैं। लेकिन राजनीति के गलियारों से निकलकर आध्यात्म की ओर मुड़े प्यारे मोहन ने एक क्रांतिकारी सवाल खड़ा किया— “क्या बुढ़ापा सबसे खूबसूरत नहीं हो सकता?”

​तर्क सरल है: अगर बचपन नींव है और जवानी संघर्ष, तो बुढ़ापा तो उस पूरे सफर का ‘शिखर’ (Peak) होना चाहिए। फिर ऐसा क्यों है कि हमें बुढ़ापे में केवल कमजोरी, लाठी और झुर्रियां ही नजर आती हैं?

​महावीर का क्रांतिकारी सूत्र

​भगवान महावीर का दर्शन यहाँ एक गहरा उत्तर देता है। आमतौर पर हिंदू परंपरा में माना जाता है कि धर्म और योग बुढ़ापे के लिए हैं। लेकिन महावीर ने इसे पलट दिया। उन्होंने कहा:

​”जब तक इंद्रियां अशक्त नहीं होतीं, तब तक धर्म का आचरण कर लेना चाहिए। बाद में कुछ नहीं होगा।”

शक्ति का रूपांतरण:

महावीर के अनुसार, जो ऊर्जा संभोग (भोग) बनती है, वही ऊर्जा समाधि (योग) भी बनती है। यदि हमने जवानी की पूरी शक्ति केवल भोग और वासना में लुटा दी, तो बुढ़ापे में हमारे पास ‘राम नाम’ जपने के अलावा कोई ऊर्जा शेष नहीं बचती। तब धर्म केवल एक मजबूरी बन जाता है, आचरण नहीं।

​क्यों कुरूप लगता है बुढ़ापा?

​बुढ़ापा शारीरिक घटना कम और मानसिक अधिक है। जब एक व्यक्ति जीवन भर गलत रास्तों पर चलता है, तो बुढ़ापे में ऊर्जा खाली हो चुकी होती है और हाथ में केवल पछतावे की राख बचती है। यही पछतावा चेहरे पर ‘कुरूपता’ बनकर उभरता है। झुर्रियों को ब्यूटी पार्लर ढक सकता है, लेकिन भीतर की ‘दीनता’ और खोई हुई ‘हिम्मत’ को नहीं।

​सौंदर्य का असली अर्थ

​बुढ़ापा तब सुंदर बनता है जब:

  • ऊर्जा का संरक्षण हो: जिसने जवानी में अपनी शक्ति को ध्यान और शुभ कार्यों में रूपांतरित किया हो, उसके चेहरे की झुर्रियों से भी आत्मिक तेज (Aura) झलकता है।
  • अनुभव की शुभ्रता: सफेद बाल और झुर्रियां तब सुंदर लगती हैं जब उनके पीछे एक निर्दोष और अनुभवी मन हो। ऐसा व्यक्ति बच्चों से भी ज्यादा मासूम हो जाता है।

​निष्कर्ष: तथ्यों से परे सत्य

​यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में महावीर, बुद्ध या कृष्ण की मूर्तियां कभी बूढ़ी नहीं बनाई गईं। यह कोई ऐतिहासिक चूक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक सत्य है। जो भीतर से जागृत है, वह समय की मार के बावजूद सदा जवान रहता है।

प्यारे मोहन का संदेश साफ है: यदि आप चाहते हैं कि आपका बुढ़ापा ‘ब्यूटी’ बने, तो उसकी तैयारी आज की ऊर्जा से करनी होगी। शक्ति जब शिखर पर हो, तभी उसे रूपांतरित करें, ताकि जब शरीर ढले, तो भीतर का दीया और प्रज्वलित हो उठे।

Yogesh Soni Editor
Yogesh Soni Editorhttp://khabaronkiduniya.com
पत्रकारिता मेरे जीवन का एक मिशन है,जो बतौर ए शौक शुरू हुआ लेकिन अब मेरा धर्म और कर्म बन गया है।जनहित की हर बात जिम्मेदारों तक पहुंचाना,दुनिया भर की वह खबरों के अनछुए पहलू आप तक पहुंचाना मूल उद्देश्य है।
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