”अजी, ये तो वो हाल हो गया कि दूल्हा घोड़ी पर बैठा-बैठा बूढ़ा हो जाए और बाराती भूख के मारे अपने-अपने घर जाकर सो जाएं। जब विस्तार होगा, तब तक तो मंत्री बनने का मज़ा वैसा ही फीका हो जाएगा, जैसे बिना नमक की खिचड़ी।”
प्यारे मोहन ने आज सुबह-सुबह चाय की चुस्की के साथ अखबार पटका और बोले, “भाई साहब, ये मंत्रिमंडल का विस्तार है या कोई गुप्त खजाना? जिसे देखो वही ‘तारीख पे तारीख’ वाला वकील बना घूम रहा है। अब तो हालत ये है कि जनता तो दूर, जो बेचारे कुर्ता सिलवाकर शपथ लेने की कसरत कर रहे थे, उन्होंने भी अब कुर्ते की तह बनाकर अलमारी में रख दी है।”
त्योहारों की ‘चुनावी’ दौड़
प्यारे मोहन का दर्द जायज भी है। उन्होंने उंगलियों पर गिनाना शुरू किया:
- दिवाली पर लगा कि लक्ष्मी जी के साथ ‘पद’ भी घर आएगा, पर केवल दीये जलकर बुझ गए।
- एकादशी आई, व्रत रखा कि शायद लिस्ट खुल जाए, पर नसीब में केवल साबूदाना खिचड़ी रही।
- संक्रांति पर पतंग उड़ी, पर सत्ता की डोर हाथ नहीं आई।
- शिवरात्रि पर भांग के साथ उम्मीदें भी चढ़ीं, पर डमरू कहीं और ही बजता रहा।
- होली निकल गई, रंग उतर गया, लेकिन मंत्रिमंडल का ‘गुलाल’ अब तक चेहरे पर नहीं लगा।
इंतज़ार की इंतहा
”अब तो नवदुर्गा भी विदा होने को है,” प्यारे मोहन ठहाका मारते हुए बोले, “कहीं ऐसा न हो कि जब तक लाल बत्ती वाली गाड़ी का नंबर आए, तब तक गाड़ी का मॉडल ही पुराना हो जाए। दावेदारों की दाढ़ी इतनी बढ़ गई है कि शपथ लेने जाएंगे तो पहचान पत्र (ID) दोबारा बनवाना पड़ेगा।”
