Wednesday, March 4, 2026
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होली का वह कौन सा असली रंग हे, जो साबुन से नहीं, समर्पण से चढ़ता है

​एक सच्चा प्रेमी या भक्त उस क्षणिक रंग की कामना कभी नहीं करता जो शाम तक धुल जाए। उसकी जिद तो उस रंग के लिए होती है जिसके बारे में कहा गया है:

​आज होली की सुबह जब मेरे प्रिय मित्र प्यारे मोहन हाथ में गुलाल लिए इस जिद के साथ आए कि “आज तो रंग कर ही जाएंगे”, तो हंसी-ठिठोली के बीच एक गहरी चर्चा छिड़ गई। मैंने मजाक में कहा— “दोस्त, रंगना ही है तो ऐसे रंग से रंगो जो कभी छूटे नहीं, वरना ये बाजारू रंग तो साबुन की एक फटकार भी नहीं सह पाएंगे।”

​प्यारे मोहन तपाक से बोले— “ऐसी बातें मत करो! दुनिया का हर रंग देर-सबेर उतर ही जाता है। ऐसा कोई रंग बना ही नहीं जो जीवन भर चढ़ा रहे।”

​प्रेम का रंग: जहां जात-पात और ऊंच-नीच बेमानी है

​मैंने मुस्कुराते हुए उन्हें समझाया कि दुनिया के बाकी सब रंग उस ‘प्रेम के रंग’ के आगे बेरंग हैं। यह एक ऐसा रंग है जिसमें रंगने के बाद इंसान को न अपनी जात याद रहती है, न कुल-खानदान और न ही ऊंच-नीच का बोध रहता है। यह रंग त्वचा पर नहीं, आत्मा पर चढ़ता है। और एक बार चढ़ जाए, तो जन्म-जन्मांतर निकल जाते हैं, पर इसकी चमक फीकी नहीं पड़ती।

​जब प्यारे ने कहा कि बात सर के ऊपर से निकल गई, तो मुझे उन्हें भक्ति के उस अटूट उदाहरण से समझाना पड़ा जिसे सदियों से भक्त गाते आए हैं।

​”ऐसी रंग दे, कि रंग नहीं छूटे…”

​एक सच्चा प्रेमी या भक्त उस क्षणिक रंग की कामना कभी नहीं करता जो शाम तक धुल जाए। उसकी जिद तो उस रंग के लिए होती है जिसके बारे में कहा गया है:

“ऐसी रंग दे, कि रंग नहीं छूटे,

धोबिया धोए चाहे, सारी उमरिया…

श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया।”

​यह वह जिद है जहाँ भक्त कहता है कि भले ही सारी उम्र बीत जाए, पर जब तक उस ‘श्याम’ के रंग में नहीं रंगूंगी, घर नहीं जाऊंगी। यही वह असली रंग है जो धुलने से और गहरा होता है।

​सात जन्मों का साथ और गीता का सार

​इस रंग की महिमा को हम दो स्तरों पर समझ सकते हैं:

  1. सांसारिक प्रेम: जब हम पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका के प्रेम की बात करते हैं, तो अक्सर सात जन्मों के साथ की दुआएं मांगी जाती हैं। माना जाता है कि आज का मिलना पिछले जन्म के किसी अधूरे वादे का परिणाम है।
  2. आध्यात्मिक भक्ति: गीता में स्वयं भगवान कृष्ण कहते हैं कि भक्त की भक्ति शरीर के साथ समाप्त नहीं होती। यदि इस जन्म में साधना अधूरी रह जाए, तो अगले जन्म में वह शून्य से शुरू नहीं करता, बल्कि वहीं से आगे बढ़ता है जहाँ पिछला सोपान छूटा था। यानी “पिछली क्लास” का ज्ञान और संस्कार अगले जन्म में भी उसके साथ रहते हैं।

​निष्कर्ष

​तो इस होली, आइए सिर्फ गुलाल से नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति के उस पक्के रंग से रंगे जाएं जो बुढ़ापे, मृत्यु और समय की मार से भी न छूटे। क्योंकि असली होली वही है, जो अंतर्मन को रंग दे।

आप सभी को प्रेम और सौहार्द की होली की हार्दिक शुभकामनाएं!

Yogesh Soni Editor
Yogesh Soni Editorhttp://khabaronkiduniya.com
पत्रकारिता मेरे जीवन का एक मिशन है,जो बतौर ए शौक शुरू हुआ लेकिन अब मेरा धर्म और कर्म बन गया है।जनहित की हर बात जिम्मेदारों तक पहुंचाना,दुनिया भर की वह खबरों के अनछुए पहलू आप तक पहुंचाना मूल उद्देश्य है।
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