
एक स्थान पर दो व्यक्तियों का आपसी वार्तालाप सहसा सुनाई दिया। एक ने शिकायत की है कि उन्होंने विवाह का आमंत्रण आपके लिए व्हाट्सएप किया था, किंतु आप पहुंचे नहीं । यह सुनकर दूसरे सज्जन बोले मैं शायद देख नहीं पाया। तुम कम से कम एक फोन तो कर देते, ऐसे चुपचाप मुझे भला क्यों आमंत्रित किया ही क्यों ? दरअसल इस डिजिटल दौर में ढेर सारे लोग अपने आमंत्रण और निमंत्रण सोशल मीडिया पर प्रेषित कर मुक्त हो रहे हैं। इस प्रत्याशा के साथ की हमने तो सूचित कर दिया है अपनी जिम्मेदारी समाप्त हुई।

प्रश्न यह है कि क्या यह तरीका उचित है? औपचारिक और सामान्य आयोजनों में तो यह बात एक पल के लिए चल भी जाए किंतु जहां कोई वैवाहिक, पारिवारिक आयोजन हो तो वहां की बात बिल्कुल अलग हो जाती है और होनी भी चाहिए। मुझे याद आता है कि पिछले वैवाहिक सीजन में एक अत्यंत आत्मीय सज्जन अपनी बेटी के विवाह का आमंत्रण देना भूल गए। अचानक विवाह के दिन सुबह – सबेरे उनका फोन बजा कहने लगे आशीष भाई! बड़ी चूक हो गई मैं आज बिटिया का विवाह है और मैं निमंत्रण देना भूल गया हूं , मेरे इस फोन का मान रखिए और सपरिवार अवश्य पधारिए।
मैंने उनके उस अपनत्व और अधिकारपूर्वक किए फोन को कार्ड से अधिक महत्वपूर्ण माना और सपरिवार पहुंच गया। वे पुलकित हो उठे, मुझे बांहों में भर लिया। बात बुलाने – बुलाने की है कौन किस भाव से बुला रहा है कितनी रस्म अदायगी है और कितनी रिश्ते की प्रगाढ़ता, यह भला कौन नहीं जानता। व्हाट्स एप पर किए संदेशों में आमतौर पर एक नीरवता सी झलकती है। हां, यदि उसके पीछे कोई माधुर्य और स्नेह भरा फोन कर दे तो उस भावहीन निमंत्रण में प्राणतत्व आ जाते हैं। यह कोई आवश्यक नहीं है कि कोई आपके द्वारे आकर हाथ में काॅर्ड थमाए। इस दौर में कुछेक तो ऐसे भी हैं जो व्हाट्सएप ग्रुपों में ही कोई शादी कार्ड प्रेषित कर देंगे फिर उलाहना देंगे कि आप आए नहीं ,वे धन्य हैं।
सूत्र यह है कि यदि हम किसी को वास्तविक अर्थ में आमंत्रित और निमंत्रित कर रहे हैं तो उसका तरीका भी वैसा ही होना चाहिए। सार्वजनिक आयोजनों की बात अलग हो सकती है, व्यक्तिगत आयोजनों में यह लोक व्यवहार की दृष्टि से कदाचित अनुचित ही है।
