अब पुल गिरने पर गुस्सा नहीं, ‘माला और तिलक’ तैयार रखिये। क्योंकि जिन हाथों ने हमारे खून-पसीने की कमाई को इतनी सफाई से ‘हजम’ किया है, उनका अभिनंदन तो बनता है!
आज फिर एक पुल क्या धंसा, हमारे मित्र प्यारे मोहन का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। बोले, “अरे भाई, पैसे ही खाने हैं तो सीधे डकार लो, पर कम से कम कंक्रीट में रेत तो मत मिलाओ!”
हमनें उन्हें शांत करते हुए कहा, “मोहन भाई, आप पुराने खयालात के आदमी हैं। आप इसे भ्रष्टाचार कह रहे हैं, जबकि यह तो ‘डिजाइनर विफलता’ है। आप तो बस पुल गिरते देख रहे हैं, उन ठेकेदारों की मेहनत नहीं देख रहे जिन्होंने कागजों पर इसे सदियों तक खड़ा रखा।”
विकास की ‘चीखती’ गवाही
प्यारे मोहन का तर्क भी अपनी जगह पत्थर की लकीर था। उन्होंने कहा कि ये गिरते ब्रिज, धंसती सड़कें और ढहते भवन कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि खुद भ्रष्टाचार की गवाही दे रहे हैं। विडंबना देखिए कि सज़ा के नाम पर सिर्फ ‘ब्लैक लिस्ट’ का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है, जबकि नियम तो यह होना चाहिए कि पैसे की वसूली भी हो और जेल की हवा भी मिले।
कर्ज का ‘अभिनंदन’
हमनें प्यारे मोहन को समझाया— “दोस्त, गुस्सा थूक दो। पिछले 22 सालों में हमने भ्रष्टाचार की जो ऊँची इबारत लिखी है, उसे समझने के लिए बड़ा जिगरा चाहिए। प्रदेश पर हर महीने कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। कहने को तो यह सरकार पर कर्ज है, पर असल में यह आपकी और हमारी जेब पर सीधा प्रहार है। टैक्स बढ़ेगा तभी तो कर्ज चुकेगा!”
इसलिए, अब विरोध छोड़िए और अभिनंदन की तैयारी कीजिए:
- जहाँ भी पुलिया टूटी दिखे, वहाँ के ठेकेदार का तिलक-रोली से स्वागत करें।
- जहाँ सड़क धंसी हो, वहाँ इंजीनियर को शाल-श्रीफल भेंट करें।
- उन्हें धन्यवाद दें कि उन्होंने हमारे खून-पसीने की कमाई का ऐसा ‘जोरदार सदुपयोग’ किया कि उद्घाटन की चमक फीकी पड़ने से पहले ही ढांचा ज़मींदोज हो गया।
