Thursday, March 26, 2026
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ब्रज यात्रा: जहाँ पांडित्य पर भारी पड़ा पत्नियों का प्रेम ऐसा हे भतरौंड बिहारी मंदिर,जाने कैसे पहुंचे मंदिर

भतरौंड बिहारी मंदिर श्री कृष्ण की अनूठी लीलाओं का केंद्र है। यह मंदिर उस ऐतिहासिक घटना का साक्षी है, जब स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने भूखे होने का अभिनय कर भक्तों की परीक्षा ली थी

यहाँ ब्राह्मण पत्नियों ने कृष्ण को ‘भात’ (भोजन) अर्पित किया था, जिस कारण इस स्थान का नाम ‘भतरौंड’ पड़ा।

​वृंदावन के अक्रूर घाट के समीप, अशोक वन (राजपुर वाँगर) की शांत वादियों में स्थित भतरौंड बिहारी मंदिर श्री कृष्ण की अनूठी लीलाओं का केंद्र है। यह मंदिर उस ऐतिहासिक घटना का साक्षी है, जब स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने भूखे होने का अभिनय कर भक्तों की परीक्षा ली थी।

📜 पौराणिक इतिहास: यज्ञ की आहुति और श्रद्धा का भोग

​इस मंदिर का इतिहास श्रीमद्भागवत पुराण की एक अत्यंत भावुक कथा से जुड़ा है।

  • कृष्ण की लीला: कथा के अनुसार, जब श्रीकृष्ण अपने सखाओं (ग्वाल-बालों) के साथ गाय चरा रहे थे, तब सखाओं को तीव्र भूख लगी। पास ही के गांव में कुछ ब्राह्मण ‘अंगिरस’ नामक यज्ञ कर रहे थे।
  • अहंकार का त्याग: कृष्ण के कहने पर ग्वाल-बाल वहां भोजन मांगने गए, लेकिन कर्मकांड के अहंकार में डूबे ब्राह्मणों ने उन्हें दुत्कार दिया।
  • भक्तों का समर्पण: जब यह बात ब्राह्मणों की पत्नियों को पता चली, तो वे अपने प्राणप्रिय कृष्ण के लिए छप्पन भोग लेकर वन की ओर दौड़ पड़ीं। उन्होंने लोक-लाज और पति की आज्ञा की चिंता किए बिना अपना सर्वस्व ठाकुर जी को अर्पित कर दिया।

🕉️ ‘भतरौंड’ नाम का रहस्य और महत्व

​”भतरौंड” शब्द का संबंध भोजन और भ्रमण दोनों से जोड़कर देखा जाता है:

  1. भात (भोजन): यहाँ ब्राह्मण पत्नियों ने कृष्ण को ‘भात’ (भोजन) अर्पित किया था, जिस कारण इस स्थान का नाम ‘भतरौंड’ पड़ा।
  2. विहार: कुछ विद्वानों के अनुसार यह “भतरना” (भ्रमण) से बना है, जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ बिहारी जी नित्य विहार और लीलाएं करते हैं।

🌿 मंदिर की विशेषताएँ और आध्यात्मिक वातावरण

विशेषताविवरण
मुख्य विग्रहभगवान श्रीकृष्ण का बिहारी स्वरूप, जो अत्यंत मनोहारी और दिव्य है।
परंपरायह मंदिर रसिक संत परंपरा और माधुर्य भाव की उपासना के लिए जाना जाता है।
वातावरणवृंदावन की मुख्य भीड़भाड़ से दूर, यह स्थान आज भी अत्यंत शांत और ध्यान के योग्य है।
गूढ़ संदेशयह मंदिर संदेश देता है कि ईश्वर को पांडित्य या शुष्क ज्ञान से नहीं, बल्कि केवल प्रेम से पाया जा सकता है।

दर्शन का महत्व

​भतरौंड बिहारी जी के दर्शन करने वाले भक्तों का मानना है कि यहाँ आने से अहंकार का नाश होता है और हृदय में प्रेम-भक्ति का संचार होता है। अक्रूर घाट के पास स्थित होने के कारण इस क्षेत्र का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यही वह स्थान है जहाँ से अक्रूर जी कृष्ण और बलराम को मथुरा ले गए थे।

निष्कर्ष: भतरौंड बिहारी मंदिर वृंदावन की उन गुप्त धरोहरों में से एक है, जो हमें याद दिलाती है कि भगवान केवल भाव के भूखे हैं। यदि आप शांति और प्राचीन ब्रज की संस्कृति को महसूस करना चाहते हैं, तो यहाँ की यात्रा अवश्य करें।

भतरौंड बिहारी मंदिर कैसे पहुँचें?

​यह मंदिर मुख्य वृंदावन शहर से थोड़ा हटकर अक्रूर घाट और राजपुर वाँगर क्षेत्र के पास स्थित है।

  • ई-रिक्शा/ऑटो: वृंदावन रेलवे स्टेशन या बाँके बिहारी मंदिर से आप अक्रूर मार्ग के लिए ई-रिक्शा ले सकते हैं। यह स्थान मुख्य मार्ग से थोड़ा अंदर ‘अशोक वन’ की ओर स्थित है।
  • पैदल मार्ग (परिक्रमा): यदि आप वृंदावन की सप्तकोसी परिक्रमा कर रहे हैं, तो अक्रूर घाट के पास से इस प्राचीन मंदिर के दर्शन के लिए जाया जा सकता है।
  • निकटतम लैंडमार्क: अक्रूर जी का मंदिर और अशोक वन।

🚩 पास के अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थल

​भतरौंड बिहारी जी के दर्शन के साथ-साथ आप इन आध्यात्मिक स्थलों पर भी जा सकते हैं:

  1. अक्रूर घाट (Akrur Ghat): यह वही स्थान है जहाँ अक्रूर जी को यमुना में भगवान कृष्ण और बलराम के चतुर्भुज रूप के दर्शन हुए थे जब वे उन्हें मथुरा ले जा रहे थे।
  2. अशोक वन (Ashok Van): भतरौंड बिहारी मंदिर इसी क्षेत्र में आता है। यह एक अत्यंत शांत और प्राकृतिक स्थान है, जहाँ प्राचीन काल में सघन अशोक के वृक्ष हुआ करते थे।
  3. द्वादश आदित्य टीला: यहाँ से यमुना जी का सुंदर दृश्य दिखता है। मान्यता है कि कालिया नाग मर्दन के बाद जब कृष्ण को ठंड लगी, तो यहाँ 12 सूर्यों ने प्रकट होकर उन्हें गर्मी प्रदान की थी।
  4. इस्कॉन मंदिर (ISKCON Temple): भतरौंड से कुछ ही दूरी पर रमण रेती क्षेत्र में स्थित है, जो अपनी भव्यता और कीर्तन के लिए प्रसिद्ध है।
  5. गजाधर घाट और चीर घाट: यमुना किनारे के ये प्राचीन घाट अपनी पौराणिक कथाओं (जैसे चीर हरण लीला) के लिए जाने जाते हैं।

💡 यात्रा के लिए कुछ सुझाव:

  • समय: मंदिर के खुलने और बंद होने का समय मौसम के अनुसार बदलता रहता है (आमतौर पर दोपहर 12 से 4 बजे तक पट बंद रहते हैं)। सुबह 8 से 11 बजे का समय दर्शन के लिए उत्तम है।
  • शांति का अनुभव: चूँकि यह मंदिर मुख्य बाज़ार की भीड़ से दूर है, यहाँ आप कुछ समय ‘जप’ या ‘ध्यान’ के लिए बिता सकते हैं।

Yogesh Soni Editor
Yogesh Soni Editorhttp://khabaronkiduniya.com
पत्रकारिता मेरे जीवन का एक मिशन है,जो बतौर ए शौक शुरू हुआ लेकिन अब मेरा धर्म और कर्म बन गया है।जनहित की हर बात जिम्मेदारों तक पहुंचाना,दुनिया भर की वह खबरों के अनछुए पहलू आप तक पहुंचाना मूल उद्देश्य है।
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