कितने किस्से हमने अखबारों में पढ़े होते हैं। खेलों में मैच फिक्सिंग के प्रकरणों को कौन नहीं जानता। आप सेट होने वाले व्यक्ति को सदैव डरा- सहमा पाएंगे, वह कभी मुखर नहीं रह सकता। भीतर से कुछ खींचतान चल रही होती है। जो तोला भर जमीर होगा वह मन ही मन दुत्कारता होगा कि गलत कर रहे हो, यह अनैतिक है, यह विश्वासघात है वगैरह-वगैरह। किंतु लोभ का लालच इस कदर चढ़ा होता है कि आदमी पतित होता जाएगा।

जिस समय मुख्यधारा की पत्रकारिता में नवांकुर हुआ करता था तो अपने वरिष्ठों के मुख से अनेक बार किसी अन्य पत्रकार साथी के बारे में सुनने मिलता कि वे तो ‘ सेट ‘ हो गए ( हालांकि ऐसा कहने वाले स्वयं भी लिफाफा लेकर सेट हो जाते थे / हैं ) अब वो संबंधित के विरुद्ध एक शब्द न लिखेंगे। फिर जब थोड़ी समझ विकसित हुई और दुनियादारी को समीप से देखा तो ज्ञात हुआ कि कैसे जरा से लालच और स्वार्थ के वशीभूत कोई पत्रकार क्षण भर में सेट हो जाते हैं।
पहले जाना था कि शायद पत्रकारिता में ही यह रोगाणु पसरे हैं किंतु ऐसा है नहीं। यह बीमारी सर्वत्र व्याप्त है। न सिर्फ विरोधी पार्टी के राजनेता सेट हो जाते हैं, अपितु एक ही पार्टी के नेताओं में भी सेट हो जाने का गुणधर्म पाया जाता है। न्यायालय में अधिवक्तागण भी इस परंपरा से भला कैसे अछूते रह पाएंगे, वे भी अपने प्रतिवादी पक्ष के वजन के हिसाब से सेट हो जाते हैं, अपना पक्ष ही मजबूती से न रखेंगे। जानकर आपको हरा देंगे। खेद के साथ लिख रहा हूं कि जिन न्यायधीशों को भगवान की उपमा दी जाती है वे तक सेट हो जाते हैं बस बोली ठीक लगनी चाहिए।
अपने देश के कुछ लोगों को भी शत्रु देश से सेट होते देखा है इसके भी कितने किस्से हमने अखबारों में पढ़े होते हैं। खेलों में मैच फिक्सिंग के प्रकरणों को कौन नहीं जानता। आप सेट होने वाले व्यक्ति को सदैव डरा- सहमा पाएंगे, वह कभी मुखर नहीं रह सकता। भीतर से कुछ खींचतान चल रही होती है। जो तोला भर जमीर होगा वह मन ही मन दुत्कारता होगा कि गलत कर रहे हो, यह अनैतिक है, यह विश्वासघात है वगैरह-वगैरह। किंतु लोभ का लालच इस कदर चढ़ा होता है कि आदमी पतित होता जाएगा।
सूत्र यह है कि यदि आप भी अपने किसी भी पेशे में सेट हो जाते हैं तो यह महापाप है। फिर पेशा चाहे राजनीति का हो, मीडिया का, खेल, चिकित्सा, सेना या किसी अन्य क्षेत्र का। अपने पेशे के प्रति ईमानदारी ही आत्मविश्वास और स्वाभिमान के प्रथम सोपान हैं।
अंततः, ‘सेट’ हो जाना केवल आर्थिक लाभ का सौदा नहीं है, बल्कि यह अपने चरित्र की सामूहिक हत्या हे।व्यक्ति केवल अपना पद नहीं बेचता, बल्कि उस भरोसे का कत्ल करता है जो समाज ने उस पर किया होता है। याद रखिए, सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं, लेकिन खोया हुआ सम्मान और आंतरिक शांति कभी वापस नहीं आती। चुनाव हमारा है—सुविधाजनक गुलामी या स्वाभिमानी संघर्ष?”
आशीष द्विवेदी की बाल से साभार,,,,,,,,,,
