सौरभ द्विवेदी ने केवल एक पद नहीं छोड़ा है, बल्कि उन्होंने उस प्रयोग को उसके चरम पर छोड़ा है जिसने हिंदी पत्रकारिता की भाषा बदल दी। उनका जाना मीडिया जगत के लिए कई बड़े सवाल और संभावनाएं खड़ा करता है।
- “लल्लनटॉप से सौरभ द्विवेदी की विदाई: क्या अब शुरू होगा हिंदी पत्रकारिता का ‘नया अध्याय’?”
- “जिस ‘अड्डे’ को संवारा, उसे कह दिया अलविदा! सौरभ द्विवेदी की नई पारी की तैयारी।”
- चेहरा’ ही जब ब्रांड बन जाए
लल्लनटॉप की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी एक ही थी—सौरभ द्विवेदी का व्यक्तित्व। लल्लनटॉप को इंडिया टुडे ग्रुप का बैकअप जरूर मिला, लेकिन उसे घर-घर तक पहुँचाया सौरभ के ‘कौतुक’, ‘किस्सागोई’ और ‘अड्डा’ शैली ने। अब चुनौती लल्लनटॉप के सामने है: क्या ब्रांड अपने सबसे बड़े चेहरे के बिना अपनी चमक बरकरार रख पाएगा? - इंडिपेंडेंट मीडिया 2.0 की आहट
सौरभ का खुद का ब्रांड खड़ा करने का इरादा इस बात की तस्दीक करता है कि अब बड़े पत्रकारों को किसी ‘मीडिया हाउस’ की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी मीडिया हाउस को ‘इन्फ्लुएंसर पत्रकारों’ की है।

- सब्सक्रिप्शन मॉडल: क्या सौरभ अब ‘पे-वॉल’ या कम्युनिटी सपोर्टेड मीडिया की ओर बढ़ेंगे?
- पूंजी बनाम कंटेंट: क्या वे किसी बड़े टेक-इन्वेस्टमेंट के साथ आएंगे या पूरी तरह स्वतंत्र ‘बूटस्ट्रैप्ड’ स्टार्टअप शुरू करेंगे?

- ‘लल्लनटॉप शैली’ का भविष्य
सौरभ ने ‘शुद्ध हिंदी’ और ‘अंग्रेजी मिश्रित हिंदी’ के बीच एक तीसरी राह निकाली थी—कस्बाई और देहाती लहजे वाली पत्रकारिता। अब देखना यह होगा कि उनका नया वेंचर क्या इसी फॉर्मूले को और धार देगा या वे कुछ बिल्कुल नया (जैसे पॉडकास्ट-ओनली या डेटा-सेंट्रिक मीडिया) लेकर आएंगे।
