सागर कलेक्टर महोदय का हालिया दौरा प्रशासनिक ढर्रे पर एक ताज़गी भरी दस्तक लेकर आया है। बरसों बाद यह महसूस हुआ है कि नगर में सही मायने में कोई कलेक्टर आया है जिसने केवल कागजी खानापूर्ति नहीं की, बल्कि ज़मीन पर उतरकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। इस ‘पैदल भ्रमण’ ने न सिर्फ प्रशासनिक कसावट की, बल्कि अधिकारियों को उनके अनोखे अंदाज में ज़िम्मेदारियों का अहसास भी कराया।
☕ प्रोटोकॉल से ब्रेक: बदलाव की शुरुआत
अब तक, प्रशासन की कार्यशैली एक बंधे-बंधाए प्रोटोकॉल का पालन करती थी—गाड़ियों से दनदनाते हुए आना, गेस्ट हाउस में चाय-नाश्ता करना, बंद कमरों में मीटिंग करना और फिर चले जाना। इस प्रक्रिया में, जिस मुख्य उद्देश्य के लिए अधिकारी आते थे, वह तो पूरा हो जाता था, मगर अन्य मूलभूत समस्याएं कराहती रहती थीं और उन पर किसी की नज़र नहीं पड़ती थी।
सागर कलेक्टर महोदय ने इस परम्परा को ‘अल्प विराम’ दिया। उन्होंने अपनी सरकारी गाड़ी को छोड़कर, चंद कदम ही सही, मगर पैदल चलकर निरीक्षण किया। और इसी पैदल भ्रमण ने वह सब खोलकर रख दिया, जिस पर अमूमन परदा पड़ा रहता है।
🛠️ अनियमितताओं पर सीधी प्रतिक्रिया
कलेक्टर के इस कदम ने कई अनियमितताओं को उजागर किया और अधिकारियों को उनकी ज़िम्मेदारी याद दिलाई:
जनपद के बाहर समस्याएं: जनपद कार्यालय के बाहर बैठे लोगों से सीधे उनकी समस्याओं को जाना और तत्काल हल करने के आदेश दिए। यह जनता से सीधे जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण क्षण था।

- सफाई व्यवस्था पर सवाल: जनपद से बाहर निकलते ही नालियों में कचरा देखकर सफाई कराने के निर्देश दिए।
- आधारभूत संरचना: वॉलीबॉल ग्राउंड में सुधार की ज़रूरत बताई और स्कूल के सामने लगी टूटी-फूटी कचरा पेटी पर सवाल किया।

- निर्माण में विलंब: संदीपनी स्कूल के निर्माण में हो रहे बिलंब पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए।

खाद्य एवं आवास सुरक्षा: बालक छात्रावास में पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए, उन्होंने अनोखे अंदाज में जल शुद्धता जांचने वाले अधिकारी (एस.सी. सुधीर श्रीवास्तव) को ही छात्रावास के नल का पानी पिलाया।कन्या छात्रावास में छात्राओं की शिकायतों को गंभीरता से सुना और तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए।

पैदल भ्रमण का महत्व
यह स्पष्ट है कि यदि कलेक्टर महोदय ने प्रोटोकॉल तोड़कर पैदल भ्रमण नहीं किया होता, तो इन सब बातों पर कोई गौर करने वाला नहीं था। अधिकारी अपनी रिपोर्टों में सब ठीक बताते, और ज़मीनी हकीकत जस की तस बनी रहती। इस दौरे ने उन लोगों को उनकी ज़िम्मेदारी का अहसास कराया, जिनकी जवाबदेही इन व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने की है।
कलेक्टर महोदय निश्चित रूप से धन्यवाद के पात्र है, क्योंकि उन्होंने कम ही सही, पर गौर करने योग्य काम किया।

- एक उम्मीद और एक आशंका
जनता और प्रशासन से जुड़े लोग अब इस संभावना को लेकर उत्साहित हैं कि आगे भी ऐसे ही अन्य विभागों को दुरुस्त करने के लिए कलेक्टर महोदय आते रहेंगे।
लेकिन इसके साथ ही एक आशंका भी है कि यह दौरे कहीं ‘इतिहास न बन जाएं’। उम्मीद है कि यह सिर्फ एक बार की घटना नहीं होगी, बल्कि यह एक नई प्रशासनिक संस्कृति की शुरुआत होगी, जहां ‘टेबल वर्क’ से ज़्यादा ‘ग्राउंड वर्क’ को प्राथमिकता दी जाएगी। यह ‘पैदल भ्रमण’ ही वह मंत्र है, जो प्रशासन और जनता के बीच की दूरी को मिटाकर, सुशासन की नींव को मजबूत कर सकता है।
