मप्र सागर/ इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों ने बता दिया है कि प्रशासन की लापरवाही कितनी जानलेवा हो सकती है। लेकिन अफसोस! सागर जिला प्रशासन अब भी गहरी नींद में है। शहरी क्षेत्रों में तो दिखावे के लिए अभियान शुरू हो गए हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों की हालत बद से बदतर है। सवाल यह है कि क्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग इंसान नहीं हैं? क्या उनके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी प्रशासन की नहीं है..?
ग्राम छिरारी के पत्रकार रोहित अहिरवार ने सोशल मीडिया पर प्रशासन की पोल खोलते हुए सीधे सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने हुए लिखा है कि गांवों में बनी कई टंकियों की महीनों, यहाँ तक कि सालों से सफाई नहीं हुई है। पाइपलाइन के जरिए घरों तक जो पानी पहुँच रहा है, वह शुद्ध पेयजल हे इसकी प्रमाणिकता तय कर दी गई हे क्या?
ग्रामीणों की जान से खिलवाड़: ग्रामीण क्षेत्रों में पीएचई (PHE) विभाग और ग्राम पंचायतें आखिर क्या कर रही हैं? टंकियों की सफाई के नाम पर निकलने वाला बजट कहाँ जा रहा है?

कलेक्टर महोदय ध्यान दें: पत्रकार रोहित अहिरवार ने कलेक्टर सागर से मांग की है कि वह खुद या अपनी टीम भेजकर ग्रामीण अंचल की टंकियों की हकीकत देखें। कागजी घोड़ों के बजाय धरातल पर जांच हो।
यह खबर केवल सूचना नहीं, बल्कि प्रशासन के लिए एक अलार्म है। अगर समय रहते सागर के ग्रामीण इलाकों की टंकियों की सफाई और पानी की टेस्टिंग नहीं हुई, तो किसी भी अप्रिय घटना की पूरी जिम्मेदारी पीएचई विभाग और जिला प्रशासन की होगी। जनता अब चुप नहीं बैठेगी।
