
नर्मदा जी में मगरमच्छों को बसाने की योजना के पहले मध्यप्रदेश सरकार और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने क्या कोई विस्तृत अध्ययन कराया है? क्या इस अध्ययन और निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया में नर्मदा जी के तटीय क्षेत्रों की आबादी, इसमें पवित्र स्नान के लिए पहुंचने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं से राय ली गई है ? इस योजना के औचित्य, इसमें निहित खतरे और अपनाए गए तरीकों पर कितनी गहराई से किन विशेषज्ञों ने निर्णय लिया है। … यह सब जानने की मुझे व्यक्तिगत इच्छा इसलिए है क्योंकि वर्ष में तीन चार बार नर्मदा जी में स्नान हेतु जाता हूं।

मुख्यमंत्री डा मोहन यादव ने नर्मदा जी में मगरमच्छ छोड़ने के दौरान पत्रकारों को जो बताया है उसमें सबसे प्रमुख तर्क है कि मगरमच्छ नर्मदा जी का वाहन है इसलिए इसको नर्मदा जी में छोड़ा जा रहा है। वे जानते होंगे कि मगरमच्छ उभयचर जीव है। अनुकूल वातावरण मिलने पर उनकी संख्या तेजी से बढ़ती है और इनका अपने रहवासी क्षेत्र पर इनका ही साम्राज्य हो जाता है। चूंकि ये उभयचर हैं इसलिए जलप्रपात भी इनके फैलाव को नहीं रोक सकते। वे आसपास के खेतों, जमीनों, पहाड़ियों से चल कर जलप्रपातों को पार कर सकते हैं। जिन रास्तों पर नर्मदा परिक्रमा करने वाले लोग पैदल आवागमन करते हैं उन जैसे अनेक रास्तों से शक्तिशाली मगरमच्छ अरब सागर के मुहाने से अमरकंटक के उद्गम तक आसानी से पहुंचेगा बस समय की बात है। इसमें कुछ दशक लगेंगे लेकिन यह असंभव नहीं है। वर्षा का मौसम मगरमच्छों के प्रवास का समय होता है जिसमें वे अपनी नई बसाहटें बनाते हुए क्षेत्रों का विस्तार करते हैं। अर्थात कोई यह न सोचे कि वे वहीं रहेंगे जहां छोड़े जा रहे हैं।

सागर जिले के नौरादेही अभ्यारण्य वर्तमान रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व के दो तालाबों में लगभग तीस साल पहले दो मगरमच्छ छोड़े गए थे। आज स्थिति यह है कि ये पूरे वन क्षेत्र के नदी नालों पोखरों में फैले हैं और अब सागर,दमोह,नरसिंहपुर जिलों के विभिन्न तालाबों, जलस्रोतों में दिखाई देने लगे हैं।
भविष्य में नर्मदा जी में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं और किसानों के मवेशियों पर इनके हमले होना आरंभ हुए तो सरकार सुरक्षा योजना में सैकड़ों करोड़ का फंड डालेगी। अभी नदी प्रवाह के बहुतायत तटीय क्षेत्रों में स्नान की सुविधा है, इन सब जगहों को सुरक्षित करने मगरमच्छ रोधी जाल लगेंगे ताकि श्रद्धालुओं को मगरमच्छ न खींच ले जाएं। नर्मदा जी में पवित्र स्नानों का सिलसिला हजारों साल पुराना है और प्रकृति ने इसकी जैव विविधता को इसी के अनुसार अनुकूलित किया है। इसमें मगरमच्छों का नियंत्रण भी प्राकृतिक तौर पर हुआ है।

पर्यटन से अर्थव्यवस्था बढ़ाने के व्यामोह में फंसे नेताओं को पहले नर्मदा जी के सहारे चल रहे हजारों करोड़ के धार्मिक टूरिज्म की चिंता करना चाहिए। हर विषय में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की नकल करने की आवश्यकता नहीं है। यह नर्मदा जी हैं, अफ्रीका की नील या अमेजन नदियों की भांति इसे वन्यजीव आधारित पर्यटन का आधार मत बनाइए। मैं तथ्यात्मक विवरण के साथ जानना चाहता हूं कि मगरमच्छ कैसे नर्मदा जी का पर्यावरण का संरक्षण और जैवविविधता को बढ़ाएंगे। … यदि सचमुच वन्यजीव संरक्षण के लिए कुछ करना है तो अफ्रीकी चीतों के बजाए अफ्रीका के सिंहों को लाकर मध्यप्रदेश में बसाइए। गुजरात से गिर के सिंहों को लाने की ताब आप नहीं दिखा सकेंगे। वे सिंह तो सिर्फ “प्राइड आफ गुजरात” रहेंगे भले ही एक छोटे से इलाके में रहते हुए किसी महामारी से वे लुप्त क्यों न हो जाएं। आप ईरान के जंगलों से लाकर या केप्टिविटी में रह रहे उन ईरानी चीतों का प्रजनन कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं जो मध्यप्रदेश में रहने वाले चीतों की ओरिजनल प्रजाति के हैं। सोन कुत्ते, भारतीय भेड़िए, वन भैंसे, गौर , चौसिंगा हिरण, भालू (स्लाथ), गौणावण, पहाड़ी मैना, कछुओं की अनेक प्रजातियां , कमल पुष्प की अनेक दुर्लभ प्रजातियां जैसे बहुत से वन्यजीव और वन्य संपदाएं हैं जो लुप्त होने की ओर हैं और संरक्षण मांग रहे हैं। मगरमच्छ तो मध्यप्रदेश में बहुत हैं और लगातार बढ़ रहे हैं उन से अपना मोह कम करिए मुख्यमंत्री जी…!
साभार: डॉ रजनीश जैन की वॉल से
