Thursday, March 26, 2026
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​”शौर्य वाला मल्ल-युद्ध खत्म, अब शुरू है बदबूदार ‘मलयुद्ध’!”

मल्ल-युद्ध से 'मल-युद्ध' तक का सफर; भ्रष्टाचार पर प्यारे मोहन का 'कड़वा' विश्लेषण! व्यंग

आज का समाज भ्रष्टाचार को बुरा मानना तो दूर, इसे ‘ही-ही’ करके पचा रहा है। क्या हम वाकई मल्ल-युद्ध के शौर्य से गिरकर इस बदबूदार ‘मल-युद्ध’ के खिलाड़ी बन गए हैं?

आज सुबह-सुबह प्यारे मोहन अपने चिर-परिचित अंदाज में नीम के पेड़ के नीचे बैठे कुछ ‘गहन शोध’ कर रहे थे। हमने सोचा शायद देश की जीडीपी या महंगाई पर ज्ञान देंगे, पर मोहन बाबू तो शब्दों के पोस्टमार्टम पर उतर आए। कहने लगे, “देखो भाई, ये जो ‘भ्रष्टाचार’ शब्द है न, इसे लोगों ने इतना घिस दिया है कि अब इसमें कोई धार ही नहीं बची। लोग इसे बुरा मानना तो दूर, अब इसे सुनकर वैसे ही मुस्कुराते हैं जैसे किसी ने पुराना जोक सुना दिया हो।”
​मैंने रोकने की कोशिश की, पर प्यारे मोहन कब रुकने वाले थे। अपनी आंखों का चश्मा ठीक करते हुए बोले, “अरे मियां, जरा संधि-विच्छेद तो करो! ‘भ्रष्ट’ का एक अर्थ गंदगी और मल भी होता है। तो टेक्निकली, जो भ्रष्टाचार कर रहा है, वो समाज की गंदगी का ‘आहार’ कर रहा है। सरल भाषा में कहें तो वो ‘गु’ खा रहा है!” वह बोले विदेशों में
​सुनकर एक पल को तो घिन आई, पर गौर किया तो लगा कि मोहन की ग्रामीण डिक्शनरी ने आज सीधे निशाने पर तीर मारा है।
​शिष्टाचार बनाम ‘विष्टा-चार’
​आज के दौर में भ्रष्टाचार कोई अपराध नहीं, बल्कि एक ‘म्युचुअल अंडरस्टैंडिंग’ बन गया है। पहले लोग चोरी छिपे पैसे लेते थे, अब तो फाइल पर वजन रखने की कला को ‘प्रोफेशनल स्किल’ माना जाता है। प्यारे मोहन का तर्क सीधा है—अगर आप किसी गरीब का हक मार रहे हैं या सिस्टम की गंदगी से अपनी जेब भर रहे हैं, तो आप चांदी की चम्मच से हलवा नहीं, बल्कि वही ‘पदार्थ’ खा रहे हैं जिसका जिक्र मोहन ने सरेआम कर दिया।
​ही-ही करती जनता और ‘बदबूदार’ व्यवस्था
​विडंबना देखिए, जब कोई नेता या अधिकारी करोड़ों के घोटाले में पकड़ा जाता है, तो हम और आप टीवी के सामने बैठकर ‘ही-ही’ करते हुए कहते हैं— “अरे, इसने तो बहुत हाथ साफ किया!”
​प्यारे मोहन तंज कसते हैं कि भाई, हाथ साफ नहीं किया, बल्कि हाथ गंदा किया है! पर समाज की नाक इतनी बंद हो चुकी है कि उसे अब इस महाघोटाले की बदबू भी ‘परफ्यूम’ जैसी लगने लगी है। हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ ‘मल’ खाने वाले को समाज का सबसे ‘सफल’ व्यक्ति मानकर मालाएं पहनाई जाती हैं।
​निष्कर्ष
​प्यारे मोहन की बातें कड़वी जरूर हैं, पर सच यही है। जिस दिन हम भ्रष्टाचार को एक ‘पॉश शब्द’ की तरह नहीं, बल्कि उसी ‘गाली’ की तरह देखना शुरू कर देंगे जो मोहन ने दी है, शायद उस दिन सिस्टम की थोड़ी सफाई हो पाए। वरना तब तक तो ये ‘मल-युद्ध’ जारी रहेगा और लोग बड़े प्यार से एक-दूसरे को गंदगी परोसते रहेंगे।

Yogesh Soni Editor
Yogesh Soni Editorhttp://khabaronkiduniya.com
पत्रकारिता मेरे जीवन का एक मिशन है,जो बतौर ए शौक शुरू हुआ लेकिन अब मेरा धर्म और कर्म बन गया है।जनहित की हर बात जिम्मेदारों तक पहुंचाना,दुनिया भर की वह खबरों के अनछुए पहलू आप तक पहुंचाना मूल उद्देश्य है।
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