अक्सर कई बार हम अपनी ईमानदारी और सच्चाई की बार-बार सफाई देते हैं, फिर भी बात नहीं बनती। इंसान थक जाता है यह सोचकर कि आखिर इतनी कोशिशों के बाद भी परिणाम शून्य क्यों है?
इसका उत्तर हमारे ‘कर्मों के सूक्ष्म खेल’ में छिपा है।
पुण्य का गणित और हमारी सफलता
जीवन की परिस्थितियाँ हमारे संचित पुण्यों के स्तर पर निर्भर करती हैं:
प्रबल पुण्य: व्यक्ति के सोचने से पहले ही काम सिद्ध हो जाते हैं।
मध्यम पुण्य: विचार करते ही मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
सामान्य पुण्य: सोचने के बाद किए गए प्रयासों से फल मिलता है।
क्षीण पुण्य: कठिन प्रयासों के बाद भी सफलता कोसों दूर रहती है।
भ्रम और अहंकार का जाल
विपदा तब शुरू होती है जब पुण्यकाल के प्रभाव से हमारे काम सहजता से होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में अक्सर मनुष्य भ्रम और अहंकार का शिकार हो जाता है। उसे लगता है कि यह सब उसकी योग्यता या ‘तिकड़म’ का परिणाम है। लेकिन जैसे ही पुण्यों का कोष घटता है, वही बुद्धि और वही प्रयास विफल होने लगते हैं।
समय और सामर्थ्य: अर्जुन का उदाहरण
महाभारत का वह प्रसंग इस सत्य का सबसे सटीक उदाहरण है— “भीलनी लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण।” जिस अर्जुन के गांडीव की टंकार से बड़े-बड़े महारथी कांपते थे, समय बदलने पर वही अर्जुन साधारण भीलों से अपनी रक्षा नहीं कर पाए। यह सिद्ध करता है कि सामर्थ्य व्यक्ति में नहीं, उसके ‘समय’ और ‘कर्म’ में होता है।
”बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।”
(तुलसीदास जी के रामचरितमानस में शिव जी माता पार्वती से कहते हैं कि न कोई पूर्ण ज्ञानी है, न कोई मूर्ख। ईश्वर जिसे जैसा करना चाहता है, वह क्षणभर में वैसा ही बन जाता है।)
निष्कर्ष
प्रकृति का सूत्र स्पष्ट है— जो बोया है, वही काटना होगा। अवसर, मुकद्दर और परिस्थितियाँ केवल निमित्त मात्र हैं। हकीकत तो यह है कि ‘मैने किया’ का अहंकार व्यर्थ है; हम केवल अपने ही किए हुए अच्छे-बुरे कर्मों का प्रतिफल भोग रहे होते हैं।
कर्म का विधान: जब ईमानदारी को भी सफाई देनी पड़े
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