
सब प्यार का बाप होता हे बाप का प्यार, निजी स्कूल में भाजपा नेता अभिषेक भार्गव के कहे यह शब्द साधारण नहीं हे,वरन सनातन संस्कृति को बचाए रखने का मंत्र बन गए हे। पंडित भार्गव की इस एक लाइन से विचारों का एक ताना बना तैयार हुआ कि आज जब युवा पीढ़ी अन्य के बहकावे या वक़्ती प्यार के चलते अपने पिता की इज्जत को दांव पर लगा देते हे,पिता के प्यार को रौंदकर चले जाते हे उन्हें समझना होगा कि एक पिता जिसने सारी जिंदगी,पूरी जवानी जिसके प्रेम पर न्योछावर कर दी,वह बेटा या बेटी अन्य के स्वार्थी प्रेम में अपने पिता की इज्जत,ही नहीं उनके सपने,मान प्रतिष्ठा,और हृदय को चूर चूर कर देते हे,,, क्या यही सिखा हमने रामायण,आदि ग्रन्थ से, जिन आदर्शों को स्थापित करने भगवान को अवतार लेना पड़ा, क्रिभुवन पति होते हुए भी मानवता के आदर्श स्थापित करने कष्ट भोगा,क्या यही इसका सिला हे।

पितृ-प्रेम की सनातन छाँव:
भारतीय संस्कृति में पितृ-प्रेम को केवल एक भावनात्मक बंधन नहीं, अपितु सनातन संस्कृति की आधारशिला और उसकी अटूट विरासत माना गया है। यह वह मंत्र है जो पीढ़ियों के आदर्शों और मर्यादाओं को थामे रखता है।
कविता, कहानी और इतिहास के पन्नों में दर्ज़ यह सत्य आज उस दौर से गुज़र रहा है, जहाँ “क्षणिक आकर्षण” और “वक्ती प्यार” की चमक के सामने, जीवन भर की तपस्या से अर्जित किया गया पिता का मान, इज़्ज़त और उनका निस्वार्थ प्रेम फीका पड़ने लगा हे।
वंश और मर्यादा की चिंता
यह विषय केवल भावुकता तक सीमित नहीं है, यह नस्ल, स्वभाव और प्रकृति के गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने से जुड़ा है। जब पारंपरिक मर्यादाओं और पारिवारिक सहमति को दरकिनार कर केवल ‘स्वेच्छा’ को प्राथमिकता दी जाती है, तब वंश की शुद्धता और उसके नैसर्गिक गुण (जो खानदानी रुतबा, बात और तासीर कहलाती है) मटियामेट होने लगते हैं।
यह चिंता जायज़ है कि तथाकथित ‘लव मैरिज’ के उन्माद में, जहाँ गुणों और स्वभाव का समरूप मिलान नहीं होता, वहाँ उत्पन्न होने वाली संतति में वर्ण-संकर जैसे लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं, जिसके चलते उनकी प्रकृति और स्वभाव में वह खानदानी दृढ़ता और संस्कारगत संतुलन नहीं रहता, जो पीढ़ियों के तप से अर्जित होता हे।
पितृ-प्रेम का महत्व केवल भावनात्मक नहीं है, यह संस्कृति को बचाए रखने का मंत्र है। हर युवा को यह समझना होगा कि वह जिसे त्याग रहा है, वह किसी अन्य व्यक्ति का प्रेम नहीं है, बल्कि वह ‘बाप का प्यार’ है, जो सब प्यार का बाप होता है—निस्वार्थ, निःस्वार्थ और पवित्र।
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