
अक्सर कहा जाता है कि खुशियाँ बांटने से बढ़ती हैं और दुख बांटने से घटते हैं। लेकिन गहराई से देखें तो ‘बांटना’ केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। जो लोग अपने पास मौजूद श्रेष्ठ को दूसरों के साथ साझा करते हैं, वे न केवल समाज को सुवासित करते हैं बल्कि स्वयं भी आत्मिक आनंद की सुगंध से भर जाते हैं।
प्रकृति: परमार्थ की सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका
यदि हम अपने चारों ओर दृष्टि डालें, तो प्रकृति का कण-कण हमें उदारता का पाठ पढ़ाता है।
- सूर्य और नदियां: कल्पना कीजिए, यदि सूर्य अपनी ऊर्जा को समेट कर रख ले या नदी एक स्थान पर ठहर जाए, तो क्या होगा? सूर्य अपनी ही तपन से जल उठेगा और नदी का जल सड़कर अपनी उपयोगिता खो देगा। उनका बहना और चमकना ही उनके अस्तित्व की सार्थकता है।
- वृक्ष और बादल: वृक्ष फल और छाया बांटने के लिए ही खड़े हैं। बादल यदि जल के बोझ को न बरसाएं, तो वे स्वयं फट जाएंगे।
- धरती (वसुंधरा): धरती माँ यदि बीज के बदले फसल बांटना छोड़ दे, तो जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि देना ही जीवन है, और संचय करना जड़ता है।
सम्मान और सार्थकता का आधार
समाज में सम्मान केवल धन या ज्ञान होने से नहीं मिलता, बल्कि उनके उपयोग और वितरण से मिलता है।
”तिजोरी में कैद अकूत संपदा केवल कागज का ढेर है, और मस्तिष्क में दबा हुआ ज्ञान केवल एक बोझ। सम्मान और यश केवल उन्हें प्राप्त होता है जो अपने वैभव और विद्या को परमार्थ के मार्ग पर लगा देते हैं।”
निष्कर्ष: आनंद का सूत्र
आपके मित्र का उदाहरण—जो सोशल मीडिया के माध्यम से अच्छी चीजें साझा करते हैं—यह दर्शाता है कि बांटने के लिए किसी बड़े त्याग की आवश्यकता नहीं है। एक छोटा सा विचार, एक अच्छी रील या एक प्रेरक लेख भी किसी के दिन को रोशन कर सकता है।
जीवन का सूत्र सरल है: यदि आप प्रकृति के सिद्धांत पर चलेंगे, तो आनंद, मान और कीर्ति स्वतः आपके पीछे आएंगे। आपके पास जो कुछ भी उत्कृष्ट है—चाहे वह धन हो, ज्ञान हो, मुस्कुराहट हो या विचार—उसे बांटना शुरू कीजिए। यही परमार्थ है और यही जीवन का असली उत्सव भी।
