वेलेंटाइन वीक की शुरुआत हो चुकी है। बाज़ार सजे हैं, डिस्काउंट ऑफर्स की बाढ़ आई है और स्मार्टफोन के नोटिफिकेशन ‘लव इमोजीस’ से भरे पड़े हैं। लेकिन इन सबके बीच कहीं न कहीं वो सादगी और इंतज़ार गुम हो गया है, जो आज से दो दशक पहले इस मौसम की रूह हुआ करता था।
1. ग्रीटिंग कार्ड्स की वो सुनहरी दुकानें
आज ‘मैसेंजर’ पर एक स्टिकर भेज देना बस कुछ सेकंड्स का काम है। लेकिन याद कीजिए वो दौर, जब फरवरी का महीना आते ही शहर की स्टेशनरी और ग्रीटिंग कार्ड्स की दुकानों पर मेला लग जाता था। घंटों लगाकर एक-एक कार्ड को पढ़ना, उसकी शायरी को अपनी भावनाओं से तौलना और फिर जेब खर्च बचाकर सबसे खूबसूरत कार्ड खरीदना—वो महज एक कागज़ का टुकड़ा नहीं, दिल का पैगाम हुआ करता था।
2. पिक्सल में कैद नहीं, मिट्टी में महकते गुलाब
आज हम ‘रोज डे’ पर लाल गुलाब की इमोजी भेजकर कर्तव्य पूरा कर लेते हैं। पर तब गुलाब बाग़ों की मिट्टी में महकते थे। उस एक गुलाब को दुनिया की नज़रों से बचाकर ‘उन तक’ पहुँचाने की जद्दोजहद पूरे साल की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे हसीन याद होती थी।
3. किताबों की तहों में सहेजा गया इश्क़
वह दौर डिजिटल बैकअप का नहीं, सहेज कर रखने का था।
- सबसे कम पढ़ी जाने वाली किताब: अक्सर भारी-भरकम शब्दकोश या गणित की पुरानी किताब उस गुलाब की सुरक्षित पनाहगाह बनती थी।
- सूखी रंगत, ताज़ा यादें: बरसों बाद जब वो पन्ने अचानक खुलते थे, तो भले ही पंखुड़ियाँ सूख कर भूरी हो गई होती थीं, लेकिन उनकी महक आँखों में एक साथ कई गुलदस्ते खिला देती थी। वो सूखी पंखुड़ियाँ ‘उनके’ गालों की लाली बनकर आज भी यादों के कैनवास पर झिलमिलाती हैं।
4. फोल्डर्स का सन्नाटा बनाम खतों की गर्माहट
आज हमारे फोन के गैलरी फोल्डर्स हज़ारों तस्वीरों और स्क्रीनशॉट्स से भरे हैं, लेकिन उनमें वो ‘नूर’ नहीं है। खतों और मुलाकातों के खत्म होते इस दौर ने फूलों की तासीर ही बदल दी है। अब डायरियों से सूखी पंखुड़ियाँ नहीं गिरतीं, अब तो बस फोल्डर्स के सन्नाटे में बे-नूर और बे-खुशबू डिजिटल गुलाब मुस्कुराते हैं, जिनमें चमक तो है पर रूह नहीं।
नब्ज-ए-वक्त: तकनीक ने दूरियों को कम तो कर दिया, लेकिन उन फासलों में जो तड़प और शिद्दत थी, उसे भी छीन लिया। शायद इसीलिए आज का प्यार ‘स्टेटस’ पर तो दिखता है, पर यादों की ‘तिजोरी’ में वो जगह नहीं बना पाता।
