आजकल सोशल मीडिया के कुरुक्षेत्र में ‘लल्लनटॉप’ वाले सौरभ द्विवेदी के इस्तीफे का शोर ऐसे मचा है, जैसे कलयुग में साक्षात देवर्षि नारद ने वीणा त्याग दी हो। अब जब पूरी दुनिया इस ‘डिजिटल विलाप’ में डूबी हो, तो हमारे मित्र प्यारे मोहन अपनी टिप्पणी की मिसाइल न दाग़ें, ऐसा तो संभव ही नहीं था।
शाम को मिलते ही प्यारे मोहन ने मोर्चा संभाला और सवाल दागा— “आखिर ऐसा क्या है सौरभ में जो इतना हल्ला है? पोर्टल तो ‘लल्लन’ रह गया और सौरभ खुद ‘टॉप’ हो गए!”
मैंने एक गहरी सांस ली और प्यारे मोहन के कंधे पर हाथ रखकर बड़े इत्मीनान से समझाया, “देखो प्यारे, यह वक्त ‘ब्रांड’ का है और ब्रांड किसी पुराने बरगद की तरह होता है। जैसा कि पुरानी कहावत है— बरगद इतना विशाल होता है कि वह अपने नीचे ‘दूब’ (घास) तक को पनपने नहीं देता। लोग समझते हैं कि वे बरगद की टहनियों पर बैठकर आकाश छू रहे हैं, पर सच तो यह है कि उनकी हैसियत बस उस छांव तक ही सीमित होती है।”
मैंने आगे जोड़ते हुए कहा, “कीमत हमेशा ब्रांड की होती है, व्यक्ति की नहीं। इस मायाजाल में कई बार पात्रता न होने पर भी ‘ब्रांड’ के नाम की खैरात में इज्जत मिलती रहती है। जिस दिन ब्रांड का साथ छूटा, उस दिन आईना भी पहचानने से इनकार कर देगा कि तुम वही ‘लल्लन’ हो जो कल तक ‘टॉप’ पर बैठे थे। अपने यहाँ भी ऐसे कई तुर्रम खानों के उदाहरण भरे पड़े हैं, जिनका ब्रांड क्या गया, लोगों ने बरसों से दबाकर रखी सारी बुराइयां तिजोरी से बाहर निकाल लीं।”
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प्यारे मोहन अब ध्यान से सुन रहे थे, तो मैंने तंज का तड़का थोड़ा और बढ़ा दिया— “प्यारे, यह पद और प्रतिष्ठा सब बड़े नेता और ‘कॉर्पोरेट भृकुटि’ पर टिके होते हैं। जिस दिन देने वाले की भौहें टेढ़ी हुई, उस दिन दुकान लुटते देर नहीं लगती। तुम चाहे कितने ही बड़े ‘डिजिटल सूरमा’ बने रहो या नेता, पर सच्चाई यही है कि यह संसार केवल माया और भ्रम का एक वीडियो है जिसे लोग हकीकत मानकर लाइक और शेयर कर रहे हैं। आज शोर है, कल सन्नाटा होगा। कुछ दिन बाद लोग गूगल पर ढूंढते फिरेंगे कि वह सौरभ कहाँ गए?”
मेरी इस दार्शनिक डोज ने प्यारे मोहन की जिज्ञासा का शमन कर दिया। उन्होंने जीवन में पहली बार मुझे ‘शुक्रिया’ कहा और चुपचाप ऐसे चलते बने जैसे किसी ब्रांडेड दुकान से भारी डिस्काउंट मिलने की उम्मीद टूट गई हो।
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