लेखक- गोविंद अग्निहोत्री
चुप्पी तो तोड़नी ही होगी… इसमें जितनी देर करेंगे, उतने ही ज्यादा नुकसान की आशंका गहराती जाएगी, क्योंकि तमाम तरह के साइबर अपराध अब सिर्फ तकनीकी चुनौती नहीं रहे। यह किसी की भी प्रतिष्ठा, मान-सम्मान को तहस-नहस करने का जरिया भी बन गए हैं। अपराध का ऐसा ही घिनौना रूप है साइबर यौन उत्पीड़न। इसमें ‘बगल के घर’ में बैठा या सात समंदर दूर बैठा ‘अनजान’ अपराधी यौन उत्पीड़न या शोषण करने के लिए, लड़कियों-महिलाओं-बच्चों का भरोसा हासिल करने के लिए सोशल मीडिया या मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के सहारे भावनात्मक संबंध स्थापित करता है। फर्जी अकाउंट बनाकर दिलो-दिमाग पर कब्जा करता है। बच्चों को फंसाने के लिए गेमिंग वेबसाइट, सोशल मीडिया, चैट रूम, ई-मेल आदि का इस्तेमाल करता है। जब लगता है जाल सही जगह फेंका है, तब शुरू होता है यौन उत्पीड़न का खेल। यह अपराध खामोशी की वजह से पनपता रहता है। घर में अभिभावकों की व्यस्तता या ‘साथी’ की बेरुखी के कारण भी कोई अपना कब स्याह दलदल में धंसता जाता है, इसका पता ही नहीं चल पाता। दिमाग तब ठनकता है जब पानी सिर से ऊपर हो जाता है। ऐसा होने से पहले चुप्पी तोड़नी होगी। बड़ों को समझना होगा, बच्चों को समझाना होगा। आवाज उठाने का सकारात्मक नतीजा भी निकलता है। हुआ भी है। हाल ही में मध्यप्रदेश साइबर पुलिस ने ‘ऑपरेशन नयन’ चलाया। जनवरी 2024 से मिलीं 833 शिकायतों पर 50 एफआइआर दर्ज कीं। 40 आरोपियों को दबोचा भी। ये शिकायतें पीड़ितों ने कीं। यदि गहनता से पड़ताल की जाए और पीड़ित सामने आएं तो आंकड़े नि:संदेह आंखें खोलने वाले होंगे। यह भी गौर करने वाली बात है कि डिजिटल दुनिया का विस्तार होने के साथ ही सामाजिक शासन की नैतिक कल्पना का भी विस्तार किया जाना चाहिए। जवाबदेही, सहानुभूति की भी जरूरत है। तकनीकी ज्ञान से अपराधी की मंशा को भांपना, जानना-समझना भी आना चाहिए। अपराधों के खिलाफ चुप्पी तो तोड़नी ही होगी। ना का मतलब ना कहना- सीखना होगा… सजगता के साथ-समय रहते।
- लेखक पत्रिका अखबार में डिप्टी न्यूज एडिटर हैं
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