यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि राजस्थान और ब्रज के गहरे सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक भी है।
यहाँ इस मंदिर के इतिहास और खास बातों का विवरण दिया गया है:
- मंदिर का निर्माण और इतिहास
- निर्माता: इस भव्य मंदिर का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय (Sawai Madho Singh II) ने करवाया था।
- समय काल: मंदिर का निर्माण कार्य लगभग 1881-1882 में शुरू हुआ था और इसे पूरा होने में लगभग 30 से 40 साल का लंबा समय लगा। मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा 1917 के आसपास हुई थी।
- प्रेरणा: महाराजा ने यह मंदिर अपने आध्यात्मिक गुरु ब्रह्मचारी श्री गिरिधारी शरण जी की इच्छा और प्रसन्नता के लिए बनवाया था।

- अनोखा परिवहन इतिहास: अपनी रेल लाइन
इस मंदिर के इतिहास की सबसे रोचक बात यह है कि इसके निर्माण के लिए राजस्थान से भारी लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) लाने के लिए महाराजा ने मथुरा से वृंदावन के बीच एक विशेष रेलवे लाइन बिछवाई थी। पत्थरों को ढोने के बाद ही इस मार्ग का उपयोग आम जनता के लिए किया जाने लगा। - वास्तुकला की विशेषताएँ
जयपुर मंदिर अपनी राजस्थानी और मुगल वास्तुकला के मिश्रण के लिए जाना जाता है।

- विशालता: यह वृंदावन के सबसे बड़े और सबसे ऊंचे मंदिरों में से एक है।
- नक्काशी: मंदिर के स्तंभों (Pillars) और दीवारों पर बहुत ही बारीक और सुंदर नक्काशी की गई है। मुख्य प्रांगण में 16 विशाल खंभे हैं जो एक ही पत्थर को तराश कर बनाए गए हैं।
- गर्भगृह: मंदिर के मुख्य हॉल को तीन भागों में बांटा गया है:
- मध्य भाग: श्री राधा-माधव जी।
- उत्तरी भाग: श्री आनंद बिहारी जी।
- दक्षिणी भाग: श्री हंस गोपाल जी (और अन्य देवता)।

- अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- प्रबंधन: इस मंदिर की देखरेख आज भी राजस्थान सरकार (देवस्थान विभाग) द्वारा की जाती है।
- गौशाला: मंदिर परिसर के पीछे “श्रीपाद बाबा गौशाला” है, जो क्षेत्र की बड़ी गौशालाओं में से एक है।
- शांति और वातावरण: बांके बिहारी मंदिर की भीड़भाड़ से दूर, यह मंदिर अपने शांत वातावरण और विशाल खुले प्रांगण के लिए जाना जाता है।
